खेल
'न चुनना ही सबसे खतरनाक है...!'
लगता हैं प्रगतिशील लेखक संघ की प्रगति रुक रही हैं..! शायद इसीलिए प्रलेस के सम्मेलन का दूसरा दिन पहले जैसा नहीं था...! पहला दिन देश की चिंता पर था और वो बातें हुई थी जो हर आम ओ खास को सुनना चाहिए थी। दूसरे दिन मायूस हुए कि प्रलेस में उभरते ‘वैचारिक घालमेल’ और ‘भरोसे’ पर था, लगता हैं प्रलेस में अब पहले जैसे वैचारिक मजबूत लोग नहीं आ रहे हैं, जो आ रहे हैं वे दूसरे विचारों से भी जुड़े रहते हैं या ये भी हो सकता हैं कि वे लेखक बनने के लिए या लेखनी को मजबूत करने क लिए प्रलेस में आते हैं। इसी के आसपास बातें हुई, जिसमें राकेश वानखेड़े ने अच्छा कहा, ‘‘हमें यहां किसी ने थोपा नहीं हैं, हम अपनी मर्जी से आए हैं, हमें दोहरा चरित्र नहीं रखना चाहिए, आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, सत्यशोधक समाज आंदोलन ये सब खुद को प्रगतिशील मानते थे, लेकिन ये सब एक ही पेट में चले गए हैं। लीबरल होना बहुत खतरनाक हैं, आप अच्छाई या बुराई में से एक चुनो, न चुनना बहुत खतरनाक हैं। हम जिस माहौल से आते हैं,वो माहौल हमें असमानता, भाषा के नाम पर लड़वाना सिखाता हैं, हमें ताक़त ही नहीं देता कि हम लाखों लोगों के सामने खड़े होकर सत्य कह सके। अगर हमें अच्छा लेखक बनना हैं तो उस दायरे से बाहर निकलना होगा।’’ यहाँ से वे कम्युनिज्म में दूसरे विचारों के मेल की तरफ इशारा करते हैं और सवाल भी उठाते हैं। वे कहते हैं कि नेहरू- गाँधी,