'न चुनना ही सबसे खतरनाक है...!'

· Indore

कवि कुमार अंबुज
कवि कुमार अंबुज

लगता हैं प्रगतिशील लेखक संघ की प्रगति रुक रही हैं..! शायद इसीलिए प्रलेस के सम्मेलन का दूसरा दिन पहले जैसा नहीं था...! पहला दिन देश की चिंता पर था और वो बातें हुई थी जो हर आम ओ खास को सुनना चाहिए थी। दूसरे दिन मायूस हुए कि प्रलेस में उभरते ‘वैचारिक घालमेल’ और ‘भरोसे’ पर था, लगता हैं प्रलेस में अब पहले जैसे वैचारिक मजबूत लोग नहीं आ रहे हैं, जो आ रहे हैं वे दूसरे विचारों से भी जुड़े रहते हैं या ये भी हो सकता हैं कि वे लेखक बनने के लिए या लेखनी को मजबूत करने क लिए प्रलेस में आते हैं।

इसी के आसपास बातें हुई, जिसमें राकेश वानखेड़े ने अच्छा कहा, ‘‘हमें यहां किसी ने थोपा नहीं हैं, हम अपनी मर्जी से आए हैं, हमें दोहरा चरित्र नहीं रखना चाहिए, आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, सत्यशोधक समाज आंदोलन ये सब खुद को प्रगतिशील मानते थे, लेकिन ये सब एक ही पेट में चले गए हैं। लीबरल होना बहुत खतरनाक हैं, आप अच्छाई या बुराई में से एक चुनो, न चुनना बहुत खतरनाक हैं। हम जिस माहौल से आते हैं,वो माहौल हमें असमानता, भाषा के नाम पर लड़वाना सिखाता हैं, हमें ताक़त ही नहीं देता कि हम लाखों लोगों के सामने खड़े होकर सत्य कह सके। अगर हमें अच्छा लेखक बनना हैं तो उस दायरे से बाहर निकलना होगा।’’

यहाँ से वे कम्युनिज्म में दूसरे विचारों के मेल की तरफ इशारा करते हैं और सवाल भी उठाते हैं। वे कहते हैं कि नेहरू- गाँधी, समरसता का मॉडल अब फेल हो चुका हैं। हम समता की बात करते हैं, जो भगत सिंह और आम्बेडकर की समता के मॉडल पर हैं। मेरे लेख में आम्बेडकर को लिखा तो किसी ने कहा की आप कम्युनिज्म में आम्बेडकर को बहुत लाते हैं, तो मैंने कहा ब्राह्मनिज्म को भी तो खूब लाया गया, अम्बेडकर जी को लाने से कोई नुकसान नहीं होगा। उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा... जय भीम..लाल सलाम..!

सुधीर सज्जन ने कहा कि जब हम पुराने घर छोड़कर नए घर में आते हैं तो अपना सारा सामान वहाँ से उठा लाते हैं, हम ऐसा नहीं करते कि वहाँ भी रहे और यहाँ भी, ये मुश्किल होता हैं। वे तंज करते हैं कि... ‘‘बताओ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या हैं...?’’

शेखर मलिक ने सज्जाद जाहीर का उदाहरण देते हुए कहा कि आज के लेखक किसी संगठन में नहीं आना चाहते, भले ही जुड़ाव रखते हैं, लेकिन हमारी पहचान संगठन से ही होती है, उससे हमें काम करने का मौका मिलता हैं, पहचान मिलती है, लेकिन कुछ लोग खुद पर कम्युनिस्ट का ठप्पा नहीं लगने देना चाहते हैं, जबकि मुझे तो कोई कम्युनिस्ट लेखक कहे तो ये मुझे अच्छा लगता हैं।

लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि आज प्रलेस को खत्म करने का चौतरफा षड्यंत्र चल रहा हैं, हमें उससे निपटना हैं। आज साम्प्रदायिक आतंकवाद से भी निपटना हैं।

मोहन डेहरिया ने कहा कि ये कोई रोटरी क्लब नहीं हैं, हमारी अपनी मान्यता है, परम्परा हैं, हमें उसका पालन करना ही चाहिए। आप सेल्फी पॉइंट पर नहीं हैं कि फोटो खेंच लिया और चल दिए, आपको जिम्मेदार बनना पड़ेगा।

सत्यम पांडे ने कहा कि हमरे लेखक को बात करते हुए भी उस भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जो नेता करते हैं। हमें अपने से असहमत लोगों को लाना चाहिए। लोगों को समेटना चाहिए और अधिक लोकतान्त्रिक होना चाहिए और असहमति को भी सुनना चाहिए। आखिर में सारिका श्रीवास्तव बोलने आई, कई दिनों से सम्मेलन की तैयारी में थीं। उन्होंने ने कहा कि मैं माफ़ी चाहती हूं कि मोबाइल पर देख कर पढ़ रही हूं, क्यूंकि मैं लिख कर नहीं ला पाई। लेखक संगठन वैचारिक संगठन हैं। उसका काम अपने समय की समस्या उठाना और लोगों की बात कहना है, सारिका सपाट पढ़े जा रहीं थीं। आज हमें बरगलाया जा रहा हैं, झूट स्थापित किया जा रहा हैं, हमें इसकी जड़ तक जाना चाहिए। कॉक्रोच पार्टी का आंदोलन चल रहा हैं, पुलिस आंदोलन करने वालो की पिटाई कर रही हैं तो हम अगर वहाँ जा नहीं सकते तो हमें उसे समझना और लिखना चाहिए।

इसके बाद प्रलेस की अंदरूनी बातचीत का दौर शुरू हुआ और शाम को छोटी फ़िल्म दिखाई गई..!