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नकवी के खिलाफ पाकिस्तानी भी…

नकवी के खिलाफ पाकिस्तानी भी…

पाकिस्तानी बोले, हमारे खिलाड़ी भी नकवी से पुरस्कार न लें दुबई। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तान के गृह मंत्री और एशियाई क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष मोहसिन नकवी से ट्रॉफी लेने से इनकार कर दिया। भारतीय टीम का यह फैसला पाकिस्तान में भी चर्चा का विषय बन गया। हैरानी की बात यह रही कि कई पाकिस्तानी लोगों ने नकवी का साथ देने की जगह भारतीय टीम की तारीफ की। पाकिस्तानी यूज़र ने लिखा, “भारतीय टीम को शाबाशी। मोहसिन नकवी किसी खिलाड़ी को पुरस्कार या ट्रॉफी देने के लायक नहीं हैं।” ‘पाकिस्तानी हाइलाइट्स’ नाम के खाते ने लिखा, “पाकिस्तान की टीम को भी नकवी से ट्रॉफी नहीं लेनी चाहिए अगर वह कभी जीते। उनमें कोई योग्यता नहीं है।” एक और पाकिस्तानी ने भारत के फैसले को पूरी तरह सही बताया। उसने लिखा कि नकवी ने पाकिस्तान के क्रिकेट ढांचे को बर्बाद कर दिया है। लगातार बदलने के बावजूद पाकिस्तान की हालत खराब है। ऐसे इंसान को दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ियों को सम्मान देने का नैतिक हक नहीं है। एक पाकिस्तानी ने अपनी ही महिला टीम पर लिखा, “भारतीय टीम ने बिल्कुल सही किया। हमारे साथ खेलने की भी जरूरत नहीं। हम पूरे मैच में 55 रन बनाते हैं और एक विकेट लेने के बाद ऐसे खुशी मनाते हैं जैसे मुकाबला जीत लिया हो।” खेल पत्रकार फैजान लखानी ने कहा कि नकवी मंच पर पाकिस्तान के मंत्री नहीं बल्कि एशियाई क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष हैं, इसलिए क्र

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चैंपियन अलेक्जेंडर ज्वेरेव की कहानी

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चैंपियन अलेक्जेंडर ज्वेरेव की कहानी

न्यू यॉर्क। यूएस ओपन जीतने के बाद जब अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए तालियां बज रही थीं, तब उनकी आंखें नम थीं। कहा कि इन चाहने वालों में सबसे अहम शख्स… मेरी मां मौजूद नहीं हैं। वो कभी मुझे खेलती नहीं देखतीं… भावुक हो जाती हैं। चार साल का था, तो शुगर हो गई। डॉक्टरों ने कहा कि ज्यादा खेलना, दौड़ना या शरीर पर दबाव डालना खतरा हो सकता है। संभल कर ही गुजारना पड़ेगी। उस बीमार बच्चे को देख सब दया कर रहे थे, लेकिन मां इरिना ज्वेरेव के तेवर सख्त थे। उन्होंने कहा कि ये बीमारी मेरे बेटे की उड़ान का फैसला नहीं करेगी। उसे जो खेलना है… खेलेगा, दौड़ेगा, वो सब कुछ करेगा, जो दूसरे बच्चे कर रहे हैं। भले ही इस संघर्ष में उसकी जान ही क्यों न चली जाए। मैंने टेनिस चुना… पांच साल का था और रैकेट थाम लिया। मुझसे पहले मां जागती थीं। अलॉर्म घड़ी की क्या मजाल कि मां के जागने से पहले बज जाए। जब तक मुमकिन था, वो मेरे साथ दौड़ती थीं, खेलती थीं, खाना-पीना, दवाई… हर चीज का खयाल रखती थीं। जब कभी मैं कमजोर पड़ता, तो नाराज होती थीं। वो मुझे लड़ता हुआ देखना चाहती थीं। मैं जल्द उसकी बात समझ गया। खुद से वादा किया कि अब रुकना नहीं है। अब मुकाम हासिल हुआ है। अपनी बीमारी के बारे में पहले भी बात की है, लेकिन मां के संघर्ष को पहली बार आम कर रहा हूं। ज्वेरेव ने कहा कि मेरी तरह हर बीमार बच्चा खुशनसीब नहीं है कि जर्मनी जैसे ताकतवर देश

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