कमजोरी को ताकत बनाती है...!

सूमो सबसे कम समय का खेल है। इसे खेलने में बरसों की मेहनत है। बायोपिक ‘सूमो दीदी’ (जी-5) में किसी खिलाड़ी की ट्रेनिंग के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक संघर्षों को भी दिखाया है। वर्ल्ड (2009) के वर्ल्ड गेम्स में मिडिलवेट कैटेगरी में पांचवें स्थान पर आईं प्रोफेशनल सूमो रेसलर हेतल दवे ने भारत का नाम रोशन किया था। उनके ही जीवन पर है। किरदार निभाने वाली श्रीयम भगनानी ने सहज और दमदार अभिनय से जान डाल दी है।
यह कहानी खेल में मिले पहले पदक की तरह ही कीमती है। महिलाओं की ताकत को ‘सांस्कृतिक कमजोरी’ मान लिया जाता है। सूमो में कोई बड़ा नाटकीय मोड़ (क्लाइमैक्स) नहीं है। इसलिए, जब हेतल के पिता प्रोजेक्टर पर पूरे मोहल्ले को मैच दिखाने का मन बनाते हैं, तो राहगीर पूछ लेता है कि क्या क्रिकेट मैच है?
इस बात को बखूबी दिखाती है कि एक मिनट की जीत या हार के पीछे कड़ी मेहनत और ट्रेनिंग है। भले ही इसके संवाद थोड़े सीधे और साफ हैं, लेकिन लेखनी आमने-सामने के मुकाबले में छिपे नारीवाद को अच्छे से पेश करती है। महिलाओं के फैसले खुद लेने के अधिकार और ‘बॉडी पॉजिटिविटी’ यानी अपने शरीर को अपनाने पर जोर देना अच्छी सोच है। यह संदेश कई बार ऐसी बातचीत के जरिए दिया जाता है, जो स्वाभाविक संवाद के बजाय किसी घोषणा जैसा लगता है। फिर भी हेतल की जिंदगी मोटे शरीर को स्वीकार करने की मजबूत मिसाल है।
कहानी हेतल के स्कूली दिनों में ले जाती है, जब उसके मोटे शरीर का मजाक उड़ाया जाता था। मां जल्द से जल्द शादी कराना चाहती है। आलोचनाओं से उपजे गुस्से को सही दिशा देने के लिए हेतल के पिता उसका गुस्सा कम करने जूडो क्लास में दाखिल करवा देते हैं। वह स्टेट चैंपियन बन जाती है। कोलकाता दौरे पर आए जापानी सूमो पहलवान ताओशी से मुलाकात हेतल को मकसद देती है। मोटी होने पर किसी लड़की को तरह-तरह के संबोधनों से गुजरना पड़ता है, तनाव झेलने पड़ते हैं और शादी के बाजार में मोटापा आड़े आता है। कई बार कहा जाता है कि पढ़ाई में दिमाग नहीं चलता, लेकिन खेल में खूब दौड़ता है। यह बात भी अलग ढंग से सामने आती है। सूमो केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक ताकत से भी खेला जाता है।
मोटापे की वजह से मजाक की वजह बनती अविवाहित लड़की, अच्छा पिता, उदासीन फेडरेशन और जुनून। यह ऐसी लड़की की जिद है, जिससे इतिहास बन जाता है। मर्जी से ढालने की छूट नहीं लेते तब भी चल जाता। इतना ‘फिल्मी’ अंदाज शायद इसलिए है कि उस खेल से अलग महसूस न करें, जिसका मजाक उड़ाने के आदी हैं।
हेतल दवे के सफर को बहुत ही घिसे-पिटे अंदाज में दिखाने की भी जरूरत नहीं थी। हेतल के मुंबई के संघर्ष को कोलकाता की पृष्ठभूमि में ढाला गया है। उसका दोस्त और प्रेमी अक्षत (चैतन्य शर्मा) कुछ ज्यादा ही बनावटी है। वह ‘ऑल-इन-वन’ फिजियो और कोच है, जो हेतल पर पूरा भरोसा करता है और उसके निराश होने पर रटे-रटाए उपदेश देता है।
‘लोग क्या कहेंगे’ सोचने वाली माँ (अनुभा फतेहपुरा) और प्रोफेशनल कोचिंग के लिए बड़े जापानी चैंपियन के पीछे लगातार पड़े रहना भी फिल्मी है। हेतल के खान-पान और शाकाहारी होने से जुड़ी दिक्कत को तवज्जो नहीं दी गई है। ‘सूमो दीदी’ नाटकीय होने से बचती है। तेज रफ्तार को श्रीयम ने मेहनत से साधकर बनाए रखा है। समय के साथ आते बदलावों को अलग-अलग हिस्सों और मोंटाज में साफ देखा जा सकता है।
हेतल के चेहरे, चाल-ढाल और थकी नजरों में संघर्ष की छाप है। कड़ी मेहनत और शारीरिक बदलावों को ही बेहतरीन अभिनय का ‘सबूत’ मान लेते हैं, लेकिन भगनानी ने किरदार की मानसिक स्थिति को गहराई से समझा है। हेतल का खामोशी से उठाया गया साहसिक कदम बताता है कि पल भर का वह खेल असल में जीवन भर की लंबी लड़ाई का नतीजा है।
हेतल दवे जैसी का कुश्ती के मैट तक पहुंचना चमत्कार से कम नहीं है। सूमो दीदी इस बात को बखूबी जगह देती है। फिल्म अपनी मुख्य किरदार के जीवन को बोझिल नहीं बनाती और न ही उस पर कोई ठप्पा लगाती है।
नितेश पांडे को सौम्य और प्रगतिशील पिता की तरह देखना अच्छा लगता है। सामाजिक बारीकियों को भी अच्छे से दिखाया है। जैसे, शादी की बातचीत के दौरान हेतल को चचेरी बहन के बगल में बिठाया जाता है, ताकि वह बहन थोड़ी पतली दिखे। तलाक के दौर से गुजर रही उसकी बुआ को हेतल से प्रेरणा मिलती है। वहीं, उसका भाई पोर्न देखने के बहाने स्पॉन्सरशिप के लिए आवेदन करता है।
ट्रेनिंग का हिस्सा, जिसमें गैस सिलेंडर, बस और फुटबॉल पर कसरत शामिल है, अच्छे से फिल्माया है। जापान का ट्रेनिंग सीक्वेंस भी उतना ही बढ़िया है। इन दोनों के बीच का अंतर है कि दुनिया भर की जमीनी ट्रेनिंग दिखाता भी निश्चित स्तर तक ही पहुंचा सकती है। हालाँकि, हेतल के जूडो चैंपियन से सूमो रेसलर बनने के सफर को बहुत तेजी से दिखाया है।