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धर्म के नाम पर...

धर्म के नाम पर...

सऊदी अरब से खबर है- मस्जिद में गलत काम करने की वजह से दो को मौत की सजा। कुछ सजा को सही मान रहे तो कुछ गलत। जो सजा सऊदी में मिली, किसी और देश में भले ही ना मिलती, लेकिन हर धर्म में जरूर मिलती। हमारे देश में भी अगर ये किसी मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में होता तो अदालत से सजा भले ही न मिले, पर धर्मांध जान ले लेते। ये जिनकी पूजा करते हैं, वही धरती पर होते तो इन्हें माफ कर देते। मतलब हर धर्म को मानने वाले कट्टर और अंधे हैं। जो सजा को सही बता रहे हैं, इंसान तो कतई नहीं हो सकते और न सच्चे धार्मिक। अगर इनके बच्चे से ऐसा हो जाए तो उसके लिए यही सजा मांगेंगे या जिंदगी जीने का मौका? इन धर्म में अंधों को केन्या का नमूना देखना चाहिए, जहां पादरी पॉल मैकेंजी को चार सौ बच्चों को चर्च में भूखा रखकर मारने के जुर्म में दोषी ठहराया है, जिसे अगले महीने सजा सुनाई जाएगी। पादरी कहता था कि दुनिया का अंत नजदीक है और स्वर्ग जाने के लिए सबको भूखा रहकर जान देनी होगी। बच्चों, किशोरों, महिलाओं और आखिर में पुरुषों को भूखा रखकर मारा था। इस दुनिया में मानव जाति का सबसे ज्यादा नुकसान धर्मों ने ही किया है, सबसे ज्यादा जानें धर्म की वजह से ही गई हैं।

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जलते मकान से गुजरती है कविता!

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जलते मकान से गुजरती है कविता!

‘अगर आप कहते हैं कि गद्य का मतलब है ऐसा मकान खड़ा करना, जिसमें रहा जा सके तो मैं कहूंगी कविता उस परिंदे की तरह है, जिसे हाथ में सहेज कर जलते मकान से गुजरते हैं।’ बात कुछ अलग, पर सुनी-सी लगती है। ‘इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’ इश्क हो या कविता, गुजरना आग से ही है। बच कर नहीं निकला जा सकता, बचे तो गुजरे नहीं। झुलसे बगैर ना इश्क किया जाता है, ना लिखी कविता जा सकती है। अग्नि-स्नान की तरह होती है कविता। प्रेम में भी तो लपटें निकलती हैं, तपता है तन और मन। दिल है तो तड़पने का बहाना कोई ढूंढे। कविता होगी भीतर तो तड़पाएंगे, झुलसाएगी। विरह से उपजा होगा गीत, महादेवी वर्मा ने लिखा था। कविता, जैसे जलते मकान के भीतर गुजरती जिंदगी। कविता आकस्मिकता की मांग करती है। फौरन से पेश्तर, जो कुछ कहना है, कह दीजिए और निकल जाइए। साहित्य का नोबेल कनाडा की जिस लेखक को दिया गया, वह भी यही कहती हैं। एनी कार्सन (76)। बिलकुल माफिक सम्मान के लिए। बड़ा पुरस्कार, बड़ा जीवन मांगता है। फुटपॉथ की खरीदारी नहीं है नोबेल। ज्ञानपीठ पर भी सवाल उठे हैं, नोबेल पर नहीं उठते। साहित्य के नोबेल पर तो बिलकुल नहीं। अफवाह, विवाद, लानत-मजम्मत, छींटाकशी, वाद-अपवाद से ऊपर है साहित्य का नोबेल पुरस्कार। हर अगर-मगर से परे, पक्ष-विपक्ष से बाहर। सुपर से भी ऊपर। बॉब डिलन के वक्त थोड़ी गहमागहमी थी, निपट गई, पटरी पर आ गई। इस बार के नोब

ठहरी कांग्रेस...चलते दिग्विजय!

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ठहरी कांग्रेस...चलते दिग्विजय!

दिग्विजयसिंह फिर पैदल निकल पड़े हैं। उनकी यात्राओं से कांग्रेस भी आगे बढ़ती है या सिर्फ दिग्विजय सिंह चर्चा में आ जाते हैं? दिग्विजय गैर-राजनीतिक बता रहे हैं। इस यात्रा को भाजपा से धर्म की ठेकेदारी पर सवाल करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। उत्तरप्रदेश के उन हिस्सों से गुजरेगी जहां कांग्रेस को मेहनत करनी है, इसलिए धार्मिक पड़ावों के बीच पुराने कार्यकर्ताओं से मिलने और नए लोगों तक पहुंचने का मौका भी मिलेगा। दिग्विजय बार-बार यात्रा क्यों करते हैं, इसका जवाब पैदल चलने के तरीके में भी छिपा है। बड़ी सभा में नेता बोलकर चला जाता है, पैदल यात्रा में उसे रुकना पड़ता है। गांव पास आ सकते हैं। नाराज कार्यकर्ता बात रख सकते हैं। पुराने साथी फिर जुट सकते हैं। नेता को भी पता चलता है कि जमीन पर कौन साथ है और कौन सिर्फ तस्वीर खिंचवाने आता है। दिग्विजय के लिए इसका फायदा सियासी पकड़ बनाए रखना भी हो सकता है। राजनीति में पुराने संपर्क हमेशा जिंदा नहीं रहते। उन्हें समय देना पड़ता है। यात्रा यह मौका देती है कि नेता फिर दिखे और पार्टी के अंदर उसकी जरूरत महसूस हो। नर्मदा परिक्रमा सके बाद कांग्रेस ने उन्हें तालमेल बनाने का काम दिया। धार्मिक यात्रा के बाद कांग्रेस के काम में भी उनका इस्तेमाल हुआ। उसी बरस कांग्रेस मध्यप्रदेश में एक सौ चौदह सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और पंद्रह बरस बाद सत्ता में लौ

संघ की भीड़ में एंबुलेंस फंसी... कार छोड़ पैदल गए!

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संघ की भीड़ में एंबुलेंस फंसी... कार छोड़ पैदल गए!

दैनिक भास्कर लगातार लिख रहा था कि शराब को आखिर जहरीली क्यों नहीं माना जा रहा है और पुलिस को मानना पड़ा है। खबर ऊपर वाले पन्ने पर है और साथ ही पीठ थपथपाई है कि हमने ही सवाल उठाया था, अब नतीजा आया है। कांग्रेस इस पर लगातार बोलती रही है, लेकिन उसके प्रदेश प्रवक्ता का लड़का हिरासत में ले लिया है। इलजाम है कि जिस पेंट थिनर से शराब बनी, इसी की दुकान का था। उधर, प्रवक्ता आनंद जैन कासलीवाल कह रहे हैं कि हमने बकायदा बिल देकर पेंट थिनर बेचा था। खरीदार उसका क्या इस्तेमाल करते हैं, इसके लिए हमें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? अब जांच होगी और आगे फैसला होगा, लेकिन अभी तो खेल बिगड़ गया है। नईदुनिया ने मामले में कुछ नहीं लिखा है, हालांकि अंदर जहरीली शराब से मौत पर उठ रहे सवालों को लेकर धनंजय प्रताप सिंह ने खूब लिखा है, जिसे पढ़ना आसान नहीं है। धीरेंद्र शास्त्री ने करवा चौथ को ‘खसम पूजा दिवस’ बताया है। दैनिक भास्कर के लिए भोपाल से अनिल गुप्ता बता रहे हैं कि गांव की जल योजना के काम लेने के लिए लगाई गई करीब 183 करोड़ की फर्जी बैंक गारंटी के केस में चौंकाने वाली चिट्ठी सामने आई है। बैंक ने लिखा था कि 183 करोड़ की पूरी गारंटी फर्जी है, फिर भी फर्म ने 500 करोड़ के काम ले लिए। दमदार खबर है, पढ़ी जाना चाहिए। चीते के कत्ल पर चारों तरफ चिंता है और पत्रिका ने इसे ऊपर वाले पन्ने की बड़ी खबर बनाया है। पांच

इंसान कम हैं... तकनीक से तारीफ!

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इंसान कम हैं... तकनीक से तारीफ!

संत का निधन तैंतीस बरस पहले हो गया, तकनीक से चेहरा सामने आता है, वे बोलते हैं, प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत करते हैं और कहते हैं कि भारत आपके साथ है नरेंद्र। यह तकनीक का कमाल हो सकता है, पर सवाल है, जो आज हमारे बीच नहीं हैं, उनके मुंह से आज की राजनीति पर नई बात कहलवाने का फैसला किसने किया! दिल्ली के भारत मंडपम् में चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामी चिन्मयानंद के होलोबॉट से बातचीत की, जिसे एआइ अवतार कहा गया। स्वामी चिन्मयानंद का निधन 3 अगस्त 1993 को हुआ था। मोदी ने आशीर्वाद मांगा। डिजिटल अवतार ने उन्हें प्रधानमंत्री बने देखकर खुशी जताई और कहा कि भारत आपके साथ है नरेंद्र। मोदी ने कहा कि इस बातचीत से उन्हें 1993 में वडोदरा में स्वामी चिन्मयानंद से हुई मुलाकात याद आ गई। किसी परिचित का चेहरा और बोलने का अंदाज देखकर यादें लौट आना समझ में आता है। यहां सवाल उस नए साथका है जो दिवंगत संत के डिजिटल अवतार से दिलाया गया। किसी संत के पुराने प्रवचन नई पीढ़ी तक पहुंचाना उपयोगी काम है। उनकी किताबों को आसान भाषा में समझाना भी अच्छा इस्तेमाल हो सकता है, पर उनके चेहरे और आवाज में ऐसी बात सुनाना, जो आज के प्रधानमंत्री के हक में जाती हो, जिम्मेदारी बढ़ा देती है। सुनने वाला तो संत का चेहरा देख रहा होता है, जबकि सामने आ रहे शब्दों के पीछे तकनीक होती है। ‘भारत आ

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''वोट बचाओ, देश बचाओ महारैली में शािमल हो''

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''वोट बचाओ, देश बचाओ महारैली में शािमल हो''

इंदौर। कांग्रेस नेता एवं पार्टी प्रचारक आशीष तिवारी ने 1 नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली में मध्यप्रदेश सहित देशभर के लोगों से शामिल होने की अपील की है। इंडिया गठबंधन की रैली में मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के मुद्दे पर है। आशीष तिवारी ने कहा कि मतदाता सूची में गड़बड़ी, मतदान के अधिकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही से जुड़े सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं का समाधान चाहिए। राहुल गांधी आम लोगों के अधिकारों, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही के मुद्दे उठा रहे हैं।

‘हम ही हम हैं तो क्या हम हैं!’

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‘हम ही हम हैं तो क्या हम हैं!’

फिल्मी लेखक, गीतकार जावेद अख्तर जब खुद को नास्तिक बताते हैं तो सिर्फ यहीं नहीं रुकते हैं। धर्म की कमियां निकालते हैं और धज्जियां बिखेरते हैं। शबाना आजमी ने हाल ही में कहा कि मुसलमान हैं, लेकिन धार्मिक नहीं हैं। नमाज नहीं पढ़ती हैं और ना कभी कोई दूसरा धार्मिक काम किया है, पर ईद पसंद है, उर्दू ज़बान, शरारा और खाना भी, लेकिन धर्म से कोई खास वास्ता नहीं है। पिता कैफी आजमी नास्तिक थे। मां शौकत आजमी कुछ धार्मिक तरीकों को मानती थीं, लेकिन धर्म को लेकर सख्त नहीं थीं। बताती हैं, घर में कभी-कभार ‘माशाअल्लाह’ और ‘इंशाअल्लाह’ जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं, जिस पर जावेद अख्तर को ऐतराज रहता है। अगर कोई हर समय ‘प्रभु जी की मर्जी’ कहता रहे, तो कैसा लगेगा? मेरे लिए शब्द उनकी भाषा और सांस्कृतिक परिवेश का हिस्सा हैं। जो ईश्वर को मानते हैं, खुद को धार्मिक बताते हैं और कहीं आस्था रखते हैं, उनसे हमदर्दी है कि सबको अपने तरीके से जीने की आजादी है। जावेद अख्तर से पूछती हूं कि अगर किसी को धर्म का पालन करने से सुकून मिलता है तो ऐसा करने नहीं देना चाहिए? किसी की भावनाओं को ठेस क्यों पहुंचाना? जावेद का जवाब होता है कि धार्मिक उन्हें ठेस पहुंचाते हैं। क्या नास्तिक को भावनाएं आहत होने की शिकायत करने का अधिकार नहीं है? दोनों के अपने नजरिए हैं और यहीं से बात शुरू होती है कि जावेद अख्तर को बात कहने का हक है, लेकिन क्

मौत और तबादलों के बाद भी शराब ‘जहरीली’ नहीं!

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मौत और तबादलों के बाद भी शराब ‘जहरीली’ नहीं!

देवास शराब-कांड में अफसरों पर गाज गिरी है। दैनिक भास्कर के मुताबिक, देवास-सागर के कलेक्टर-एसपी को हटा दिया है, लेकिन सवाल है कि कार्रवाई हुई है या इनाम मिला है? सागर में सैंतीस मौतों के बाद कलेक्टर को साठ दिन बाद हटाकर पर्यटन एमडी के पद से नवाज दिया है। तबादलों और मौतों के बाद भी सरकार ने शराब को वैध माना है, जहरीली नहीं। फिर बात वही है कि मौत कैसे हुईं? पत्रिका ने इसे बड़ी जगह दी है और लिखा है कि जहरीली शराब पर रोक नहीं लगा सके। डेढ़ महीने में हुई मौतों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? जहरीली शराब से पैंतीस मौतें, सागर-देवास के कलेक्टर-एसपी हटाए। हालांकि, दैनिक भास्कर ने जो सवाल उठाए हैं, वो यहां नहीं हैं, लेकिन खबर तीखी ही है। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि जनता के बीच जाएं मंत्री और जवाब दें। तो फिर शराब मामले में भी मंत्रियों को सामने आ जाना चाहिए। जवाब तो देना चाहिए कि जिम्मेदार कौन है? नईदुनिया इसे ताबड़तोड़ कार्रवाई बता रहा है। यानी डेढ़-दो महीने बाद कुछ हुआ है तो फिर ताबड़तोड़ कार्रवाई कैसे हो गई? देवास मामले में भी कोई बड़ा एक्शन तो नहीं हुआ है। अग्रलेख भी है, जहां छोटे-मोटे सवाल उठाए हैं। चीते तो बाहर से लाए थे और कई सारे हंगामों के बाद उन्हें जंगल में छोड़ा था। कई दावे किए थे, लेकिन अब गोली मारकर चीता शावक का शिकार किया है, जिस्म में पांच छर्रे मिले हैं। ऐसा पहले पन्ने पर लिखा है

कलाकार भी इंसान ही तो है!

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कलाकार भी इंसान ही तो है!

दलेर मेहदी गाना नहीं गा पा रहे, क्योंकि नशे में हैं और इसीलिए उत्तराखंड के मंत्री उन्हें डपट रहे हैं। कई इस वीडियो को मजे-मजे से साझा कर रहे हैं, लेकिन इस भेड़चाल में सिक्के का दूसरा पहलू नहीं देख रहे। दलेर मेहदी अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां वह सिर्फ यादों को जिंदा रखने के लिए गाते हैं। शास्त्रीय संगीत वाले परिवार से आते हैं। संगीत के लिए महज ग्यारह बरस की उम्र में घर छोड़ दिया था। पटियाला घराने से ताल्लुक रखते हैं और राहत अली खान साहब की उन्होंने शागिर्दी की है। वैसे भी आजकल लगभग नब्बे फीसद कलाकार स्टेज पर ‘लिपंसिंक’ करते हैं, इसलिए उनसे अकेले में बात की जा सकती थी, लेकिन इधर तो उनके पीछे ही पिल पड़े हैं, मानो कभी बूढ़े ही नहीं होने वाले। सॉरी दलेर सर, यू आर ग्रेट। दलेर मेहदी नामी कलाकार हैं, उम्र अब साथ नहीं दे रही। शेर भी एक उम्र के बाद शिकार पकड़ नहीं पाता। ऐसे में कोई नेता किसी कलाकार की इज्जत की धज्जियां उड़ाता है, तब उस वक्त कलाकार में कैसी टीस उठती होगी! माना कि दलेर सही नहीं कर पा रहे थे, वह नशा नहीं करते। उनकी बीमारी की बात सही लगती है। खैर, वजह जो भी हो, पर कलाकार स्वभाव से भावुक होता है, इसलिए यह शिकायत मंच के पीछे भी की जा सकती थी। कई कहेंगे की बीमार थे तो कार्यक्रम क्यों किया? ऐसे लोगों को शायद पता नहीं कि बड़े शो दो-तीन महीने तय हो जाते हैं तो किसी को कैसे भान हो

जंग से सूनी गलियां!

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जंग से सूनी गलियां!

जंग मध्य-पूर्व में चल रही है, लेकिन चिंता हिमाचल के छोटे से गांव के दुकानदारों की है। किसी को गेस्ट हाउस की चिंता है तो किसी को कैफे की। यह धर्मकोट है। कांगड़ा जिले में मैक्लोडगंज के पास बसा वह गांव, जहां इजराइली इतने आते हैं कि पहचान ही ‘मिनी इजराइल’ बन गई। अब मेहमानों की आवाजाही कम है और पुलिस की निगरानी है। दुकानों पर हिब्रू में लिखे बोर्ड हैं। बेकरियों में इजराइली मेहमानों की पसंद की ब्रेड बनती है। दुकानदारों के मुताबिक, इन मेहमानों से उनके अच्छे रिश्ते हैं और रोजी-रोटी भी जुड़ी है इसलिए इजराइल में हालात बिगड़ने की खबर सिर्फ विदेश की खबर नहीं रह जाती। धर्मकोट की पहचान उसकी पुरानी जिंदगी से अलग है। यह कभी गद्दी समुदाय का गांव था, जहां पशुपालन, छोटी खेती और मजदूरी से घर चलते थे। विदेशी यात्री बढ़ने के साथ घरों में कमरे किराए पर मिलने लगे और कैफे खुल गए। कुछ ने हिब्रू भी सीख ली। आज कई परिवारों की कमाई इजराइलियों से जुड़ी है। कारोबार की खास बात मेहमानों का लंबे समय तक ठहरना है। यूरोप और अमेरिका से आने वाले पीठ पर सामान लेकर घूमते हैं और एक जगह समय बिताते हैं। कुछ दिन घूमकर चले जाने वाले और कई हफ्ते ठहरने वाले मेहमान से होने वाली कमाई में फर्क होता है। लंबा ठहराव कमरे के साथ रोज के खाने और दूसरी सेवाओं का काम भी बनाए रखता है। ये सिर्फ खाने और पहाड़ देखने नहीं आते। वृंदावन दास की कार

बम से फैसले नहीं होते!

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बम से फैसले नहीं होते!

इरान पर फिर बम बरसाने की तैयारी है। डोनाल्ड ट्रंप इस बार पहले से ज्यादा ताकत की बातें कर रहे हैं, पर सवाल वहीं कि इतनी लड़ाई के बाद भी जो हासिल नहीं हुआ और बम गिराने से कैसे मिल जाएगा। घर और कारखाने गिराए जा सकते हैं, पर जंग खत्म कैसे होगी, जवाब कौन देगा! नए हमलों के लिए इरान के परमाणु ठिकानों, मिसाइल और ड्रोन से जुड़े ठिकानों पर भी नजर है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू में बातचीत हुई है। इस बार ऐसे अमेरिकी बम की चर्चा भी है, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स’ कहा जाता है। नाम सुनकर लगता है कि इसे गिराते ही सब खत्म हो जाएगा, पर इसकी ताकत में फर्क है। यह जमीन के ऊपर बड़ा धमाका करता है जबकि इरान के कुछ परमाणु ठिकाने चट्टानों के नीचे गहराई में हैं। ऐसे ठिकानों को तबाह करने में यह कितना काम आएगा। हां, अगर आबादी के पास गिरा तो जान जरूर खतरे में पड़ सकती है। यानी जिस बम का इतना शोर है उससे तय काम पूरा होगा या नहीं, साफ नहीं है। फिर भी उसे बदल की तरह देखा जा रहा है। किसी शहर को भारी नुकसान पहुंचाना और सरकार से बात मनवा लेना एक बात नहीं है। अगर सिर्फ बम गिराने से सारे फैसले हो जाते तो अब तक बातचीत की जरूरत ही खत्म हो चुकी होती। पिछली लड़ाई ने तेल और बिजली की कीमतें बढ़ाईं। महंगाई का असर दूसरे देशों तक पहुंचा और पूरे इलाके में डर बढ़ा, पर इरान झुका नहीं। अ

ऐसे दुश्मन हों... तो दोस्त क्या करे!

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ऐसे दुश्मन हों... तो दोस्त क्या करे!

भाजपा प्रचार में उस्ताद है... फिर चाहे विपक्ष का ही क्यों ना हो! देखिए ना, प्रियंका-पुत्र का नाम भी पता नहीं था इस देश की बड़ी आबादी को, भाजपा ने रातोंरात और दिनोंदिन कंठस्थ करा दिया। दिल्ली में रेहान वाड्रा की सभी तस्वीरों की नुमाइश लग भी जाती तो क्या फर्क पड़ जाता! गोदी-मीडिया को इशारे भर की जरूरत रहती है, कोई जिक्र भी नहीं करता। सरकार ने आधे से ज्यादा तस्वीरें, यह कहते हुए नुमाइश से हटवा दीं कि इससे सद्भावना का माहौल खराब होगा। कमाल यह कि रेहान वाड्रा की सभी तस्वीरें उस आंदोलन की हैं, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की गई थी। क्या ऐसा कोई दर्दनाक, हिंसक और क्रूर दृश्य बाकी है, जो रेहान की तस्वीरों में है, लेकिन सोशल मीडिया पर नहीं देखा गया। हजारों वीडियो बता रहे हैं कि आततायी सरकार ने कितना जुल्म किया है युवा पीढ़ी पर! लड़कियों को भी नहीं बख्शा गया, मारपीट की गई और बदतमीजी भी हुई! जो वीडियो में नजर आ रहा है, चीख-पुकार सुनाई दे रही है, रेहान के चित्रों में तो नजर नहीं आएगी, सुनाई नहीं देगी। फिर भी श्वेत-श्याम चित्रों से भाजपा का चेहरा लाल क्यों हुआ जा रहा है? ये डरी हुई सरकार आजकल रस्सी को भी सांप समझ लेती है। जंतर-मंतर के चित्रों की नुमाइश से रेहान वाड्रा का जितना फायदा नहीं होता, भाजपा सरकार की अड़ंगेबाजी से होता नजर आ रहा है। यूं भी कह सकते हैं कि कांग्रेस की चाल मे

सवाल के जवाब में सवाल है, कमाल है!

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सवाल के जवाब में सवाल है, कमाल है!

ये हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सवाल आज भी पूछे जा रहे हैं, जवाब आज भी दिए जा रहे हैं, बस तरीका थोड़ा बदल गया है। क्षेत्र के पार्षद से वार्ड की बदहाली पर सवाल पूछ लिया वह तो मुस्कुरा कर आगे बढ़ गए। उनके पीछे चल रहे शख्स ने गुस्से में मुझसे ही सवाल किया- ‘आपने ये सवाल कभी पिछले पार्षद से पूछा है।’ इसे देश की बड़ी पार्टी के तमाम नेताओं से जोड़ कर भी देख सकते हैं। अगर सवाल का जवाब न देना हो तो मौन व्रत रख लिया जाए। ये हमें नेताओं से सीखने का सौभाग्य मिला। संसद रविकिशन से किसी ने कोई पूछा तो उन्होंने मौन व्रत में जवाब दिया- ‘आज मेरा मौन व्रत है।’ कभी-कभी तो सवाल पूछने वाले को जवाब में नौकरी से भी हाथ धोना पड़ता है। स्मृति इरानी की बात नहीं कर रहा हूं। सियासी दल समय-समय पर जवाब देने के नए-नए तरीके की भी खोज करते हैं। अगर कोई पत्रकार हिम्मत जुटा कर सवाल पूछ ले तो जवाब में कोई धार्मिक नारा लगा के चले जाओ। इससे सवाल करने वाले का मुंह भी बंद हो जाता और जवाब देने वाला जवाब देने से आजाद हो जाता है। जवाब देने के इस तरीके को मौजूदा राजनीति में ‘उत्तम’ माना जाता है। इसे ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ भी कह सकते हैं। सत्ता से सवाल करते वक़्त लहजा नरम, भाषा में शालीनता, चेहरे पर मुस्कुराहट, मित्रता का स्वभाव और जिस्म सम्मान में झुका हुआ। इसमें सवाल तो बहुत किए जाते हैं, पर काम का कोई नहीं

शादी नहीं लिखी…!

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शादी नहीं लिखी…!

जिसे पसंद करते थे, उसी ने कह दिया तुम्हारी किस्मत में शादी नहीं है, लेखक रस्किन बांड को पत्नी नहीं मिली, लेकिन उनके साथ कहानियां, किताबें, पहाड़ और पढ़ने वाले अनगिनत मिलते रहे। जिससे शादी करना चाहते थे, अब दादी अम्मा है। लेखक रस्किन बांड बोले, शायद शादी नहीं करना ही अच्छा रहा। जिंदगी भी अजीब खेल खेलती है। जिस लड़की के पीछे कभी दिल बिछा रहता है, बरसों बाद किसी की पत्नी, फिर मां और आखिर में दादी बन चुकी होती है। लेखक रस्किन बांड अधूरे प्रेम को 92 साल की उम्र में देखते हैं तो उस अधूरी मोहब्बत पर कोई शिकवा नहीं बल्कि हल्की सी मुस्कान आ जाती है। रस्किन बांड ने कभी बाकायदा यह फैसला नहीं किया था कि शादी नहीं करेंगे। शादी होते-होते रह गई। एक लड़की को बेहद पसंद करते थे और शादी करना चाहते थे। कोशिश भी की, लेकिन बात शादी तक नहीं पहुंची। समय गुजरता गया, रास्ते अलग हो गए और आज वही लड़की दादी अम्मा बन चुकी है। उसके आसपास पूरा परिवार है। अब बांड सोचते हैं कि जो हुआ, अच्छा ही हुआ। जिस लड़की के साथ कभी पूरी जिंदगी बिताने का सपना देखा था, आज उसकी जिंदगी बिल्कुल अलग बन चुकी है। रस्किन बांड की अपनी दुनिया किताबों, कहानियों, पहाड़ों और पाठकों से भर गई। बांड की जिंदगी में मोहब्बत का यह अकेला किस्सा नहीं था। जवानी के दिनों में लंदन में उनकी मुलाकात वियतनामी युवती से हुई थी। बांड उस समय मुश्किल से उन्नीस-

चारदीवारी से खुले आसमान तक!

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चारदीवारी से खुले आसमान तक!

जिस लड़की के स्कूल जाने पर सवाल उठाए, आज उसी के दरवाजे पर महिलाएं हुनर सीख रहीं, घर से शुरू किया बैग का कारोबार, आज हर दिन दो हजार ऑर्डर हैं।शाहीन के पिता प्रोफेसर, मां और भाई के साथ बचपन गांव में गुजरा। शादी के बाद शाहीन दिल्ली आ गईं। पति डिजाइनर थे। शाहीन के गांव में लड़कियां पांचवीं तक पढ़ लें तो बहुत था। हाईस्कूल करीब पांच किलोमीटर दूर था और वहां तक पहुंचने वाली शाहीन पहली लड़की थीं। रोज पैदल जातीं। शाहीन पढ़ाई के साथ खेलकूद में आगे रहतीं। मेडिकल की तैयारी शुरू कर दी। मगर शादी हो गई और शाहीन दिल्ली आ गईं। पति ने पढ़ाई और काम का रास्ता बंद नहीं किया। बच्चे हुए, घर की जिम्मेदारियां बढ़ीं, उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। दिल्ली में पढ़ाने लगीं। सुबह स्कूल, दोपहर में घर और फिर ट्यूशन। कोरोना में स्कूल और बाजार बंद थे। बात निकली कि कुछ अपना किया जाए। उस इलाके में बैग बनते थे। पति डिजाइन समझते थे। करीब दो लाख रुपये से काम शुरू हुआ। न कोई दुकान थी, न बड़ा दफ्तर। दो-चार ऑर्डर से शुरुआत हुई, लेकिन एक महीने में धड़ाधड़ ऑर्डर आने लगे। परिवार ने चीन और कोरिया की डिजाइन देखना शुरू की। अपनी समझ जोड़ी और बैग बनवाए। जो बैग हजार रुपये से ज्यादा का था, वह करीब डेढ़ सौ से पौने दो सौ रुपये में तैयार हो गया। कीमत 399 रुपये रखी। इसके बाद ऑर्डर ऐसे बढ़े कि घर में जगह कम पड़ गई। दो सौ, पांच सौ और फिर ह

पांच करोड़ का दु:ख!

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पांच करोड़ का दु:ख!

पैसा आदमी की जेब भर सकता है, जिंदगी की समझ नहीं। पांच करोड़ जीतने के बाद पहचान आई, लोग आए, हर महीने हजारों रुपये बांटे, लेकिन धीरे-धीरे सुकून चला गया। उस चमक से बाहर निकलने में बारह साल लग गए। जब बिहार के मोतिहारी के सुशील कुमार ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में पांच करोड़ रुपये (2011) जीते थे। आम नौजवान रातोंरात करोड़पति बन गया था। पैसा आदमी की जेब भर सकता है, जिंदगी की समझ नहीं। सुशील के साथ भी यही हुआ। पांच करोड़ जीतने के बाद उनके पास पैसा आया, पहचान आई, लोग आए और धीरे-धीरे सुकून चला गया, जो शायद पांच करोड़ मिलने से पहले ज्यादा था। टैक्स कटने के बाद सुशील के हाथ करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये आए थे। वे छोटी नौकरी करते थे, पढ़ाई कर रहे थे। पांच करोड़ मिलने के बाद अचानक दुनिया बदल गई। हर जगह बुलावे आने लगे। कार्यक्रम, सम्मान, मुलाकातें और नए-नए लोग। हर नया आदमी शुभचिंतक बनकर नहीं आया था। कुछ सलाह लेकर आए, कुछ कारोबार लेकर आए और कुछ सिर्फ यह सोच कर आए कि पांच करोड़ की नदी बह रही है, तो भर लिया जाए। सुशील ने बताया कि अलग-अलग कामों में पैसा लगाने लगे। कई जगह नुकसान हुआ। मदद मांगने वालों को भी खूब पैसा दिया। एक समय ऐसा भी आया, जब हर महीने हजारों रुपये बांट रहे थे। नेकदिली अच्छी बात है, मगर मुश्किल यह नहीं थी कि पैसा इधर-उधर जा रहा था, असली दिक्कत यह थी कि उन्हें खुद भी समझ नहीं आ रहा था कि जिंद

कहां-कहां से गुजर गया…

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कहां-कहां से गुजर गया…

‘रोजा’ में जिस चेहरे को देखकर लोग ठहर जाते थे, एक दौर ऐसा भी आया जब उसके लिए अपने पैरों पर खड़े होना मुश्किल हो गया। अरविंद स्वामी फिल्मों से दूर होकर कारोबार में जुटे थे। तभी एक हादसे में उनकी रीढ़ को चोट लगी और पैर में आंशिक लकवा हो गया। दोबारा पैरों पर खड़े होने में चार से पांच साल का इलाज लगा। कसरत नहीं कर सकते थे इसलिए वजन भी बढ़ गया। पर्दे पर लौटने से पहले उन्हें अपनी सेहत संभालनी थी। अरविंद को फिल्मों में मणिरत्नम लाए थे। ‘थलपति’ (1991) से शुरुआत हुई लेकिन अगले ही साल आई ‘रोजा’ ने उन्हें देशभर में पहचान दिला दी। फिर ‘बॉम्बे’ आई और उनका चेहरा हिंदी दर्शकों के लिए भी अपना हो गया। दिलचस्प बात यह है कि अरविंद अभिनेता बनना ही नहीं चाहते थे। उनका मन डॉक्टर बनने का था जबकि पिता चाहते थे कि वे कारोबार करें। पढ़ाई भी उसी तरफ हुई लेकिन रास्ता फिल्मों की ओर मुड़ गया। करीब 2000 में उन्होंने अभिनय से दूरी बनाई और कारोबार पर ध्यान देने लगे। उनका इरादा कुछ साल बाद फिल्मों में लौटने का था। वे कई कंपनियों में जिम्मेदारियां संभाल चुके थे। आगे चलकर ‘टैलेंट मैक्सिमस’ शुरू की जो दूसरी कंपनियों के कर्मचारियों की तनख्वाह और उनसे जुड़े काम संभालती है। कंपनी की वेबसाइट पर आज भी उनका नाम संस्थापक और चेयरमैन के तौर पर दर्ज है। इसी बीच हादसे ने जिंदगी की रफ्तार बदल दी। लंबे इलाज के बाद जब फिल्मों की बा

‘अपनी कहानी... कब्र ले जाऊंगा!’

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‘अपनी कहानी... कब्र ले जाऊंगा!’

करिश्मा ने सलमान से पूछा उनकी जिंदगी पर फिल्म बने तो कौन बनाएगा, कहा-डेविड धवन, संजय लीला भंसाली, सूरज बड़जात्या या फिर कबीर खान। सलमान खान प्यार की बात करेंगे और लोग ध्यान से नहीं सुनेंगे, ऐसा हो नहीं सकता। इस बार उन्होंने अपनी जिंदगी पर फिल्म बनाने से साफ इनकार कर दिया। करण जौहर के शो ‘कॉफी विद करण’ के नौवें सीजन में सलमान ने कहा कि उनकी कहानी उनके साथ कब्र में जाएगी। बातचीत में करिश्मा कपूर भी थीं, जिन्होंने प्यार और रिश्तों पर कई सवाल किए। करिश्मा ने पूछा कि अगर उनकी जिंदगी पर फिल्म बने तो उसे कौन बनाएगा। सलमान ने कहानी के हिसाब से चार नाम गिना दिए। हंसी-मजाक वाली फिल्म के लिए डेविड धवन और दुखभरी प्रेम कहानी के लिए संजय लीला भंसाली। खूबसूरत प्रेम कहानियों के लिए सूरज बड़जात्या और प्यार के साथ एक्शन दिखाना हो तो कबीर खान। इतने नाम बताने के बाद उन्होंने साफ कर दिया कि वह अपनी जिंदगी पर फिल्म बनने की इजाजत कभी नहीं देंगे। फिर सवाल आया कि उनकी प्रेम कहानी पर उनकी ही किस फिल्म का नाम ठीक बैठेगा। ‘तुमको ना भूल पाएंगे’ उन्हें सही नहीं लगा क्योंकि उनके मुताबिक सब एक-दूसरे को भूल जाते हैं। ‘लकी: नो टाइम फॉर लव’ भी नहीं चुना। उनका कहना था कि प्यार के लिए समय रहा है और आगे भी रहेगा। ‘सनम बेवफा’ पर बात टाल दी और आखिर में अपने लिए ‘मैंने प्यार किया’ का नाम चुना। भतीजों को प्यार की सलाह देने

70 रातों का दर्द

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70 रातों का दर्द

फिल्मी दुनिया में कुछ लोग कामयाबी से पहचाने जाते हैं, कुछ विवादों से और कुछ गिर कर उठने की ताकत से। विक्रम भट्ट तीसरी किस्म के हैं। बड़े नामों के साथ काम, आमिर खान से लेकर अक्षय कुमार और अजय देवगन तक का सफर। लंबे दौर की नाकामियां, बड़े सितारों के इंतजार से थककर अपना रास्ता चुनना और फिर डर को ही अपना हथियार बना लेना। यही वजह है कि उनकी कहानी किसी सीधी सड़क जैसी नहीं लगती। यह कभी चढ़ाई है, कभी खाई है, कभी धुंध है और कभी अचानक सामने खुलता हुआ रास्ता। उनके भीतर एक अजीब सा जिद्दीपन रहा है। वह जिद जो इंसान को झुकने नहीं देती और कभी-कभी अकेला भी कर देती है। फिल्मी दुनिया में जहां हर आदमी किसी बड़े दरवाजे के बाहर खड़ा रहना सीख जाता है, विक्रम भट्ट ने एक दिन यह तय कर लिया कि वह किसी बड़े स्टार की मेकअप वैन के बाहर जिंदगी नहीं गुजारेंगे। यह फैसला आसान नहीं था। बड़े सितारों से दूर जाना मतलब आसान पैसा, बड़ी चर्चा और सुरक्षित रास्ता छोड़ना, लेकिन उन्होंने डर को कारोबार नहीं, अपनी पहचान बना लिया। 1920 जैसी फिल्में उसी जिद से निकलीं। दुनिया ने चाहे हॉरर को हल्का समझा हो, लेकिन डर को महसूस किए बिना डर बनाया नहीं जा सकता। यह बात वही आदमी समझ सकता है जिसने अपने अंदर के डर को जिंदा रखा हो। लेकिन विक्रम भट्ट की कहानी सिर्फ फिल्मों की नहीं है। उनकी जिंदगी में वह दौर भी आया, जब बाहर से सब कुछ चमकदार दिख

गणित का देश-परदेस…!

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गणित का देश-परदेस…!

राहुल गांधी के विदेश जाने से यदि कांग्रेस हार जाती है तो नरेंद्र मोदी के जाने से भाजपा कैसे जीत जाती है? गांधी तो साल में एक-दो बार जाते हैं और मोदी तो जाते ही रहते हैं! गांधी एक बार जाकर भी ‘टूरिस्ट’ नेता हो जाते हैं और लगातार जा रहे मोदी इस आरोप से बचे रहते हैं। गृहमंत्री अमित शाह का दावा है कि वे विदेश नहीं जाते हैं, तो भाजपा जीतती रहती है और अगले तीस बरस हराना मुश्किल। मुकाबला तो मोदी और गांधी के बीच है, फिर शाह के विदेश नहीं जाने पर कैसे वोट मिल रहा है! जो शख्स मुकाबले में है ही नहीं, वोट उसे मिल रहे हैं! वह भी विदेश नहीं जाने पर! किसी चुनाव में विदेशी टूर मुद्दा रहा ही नहीं, तो नतीजा कैसे माना जा सकता है। मोदी के सैर-सपाटे जरूर मजाक का सबब रहे हैं, चुनाव का मुद्दा नहीं रहे, इसलिए शाह के दावे में जरा दम नहीं! यह दावा उलटे चुनाव आयोग का दम फुला रहा है कि कोई अगले तीस बरस जीत का दम कैसे भर रहा है, जबकि आयोग के कामकाज पर सवालिया निगाहें हैं। यही अचरज तो है कि जमीन पर भाजपा की लहर दिखती नहीं और मशीनों से सुनामी निकलती है! हकीकत में मतदाता सरकार के खिलाफ मुखर नजर आता है और नतीजा विपक्ष का सूपड़ा साफ दिखाता है। समझना मुश्किल हो जाता है कि भारी महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरोजगारी और सामाजिक पक्षपात के बावजूद भाजपा की बम्पर जीत कैसे हो गई? महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली और हरियाणा के नती

दिग्विजय की पदयात्रा में बच्चे ... नोटिस !

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दिग्विजय की पदयात्रा में बच्चे ... नोटिस !

दैनिक भास्कर के पहले पन्ने पर बड़ा खुलासा है कि तीन महीने में तीसरा शराब-कांड। देवास में तेरह की मौत है। परिवार कह रहा है कि शराब पीने के बाद पहले आंखें गईं, फिर जान। हेमेंद्र शर्मा की दमदार रिपोर्ट है, जो सरकार के लिए मुसीबत बनने वाली है। प्रशासन कह रहा है कि मौत ज्यादा शराब पीने से हुई हैं। हाइटेंशन लाइन कितनी खतरनाक है, पत्रिका के पहले पन्ने से पता चलता है। बुजुर्ग ने गुटखा खाया और तीसरी मंजिल की बालकनी से थूका। थूक पास से गुजर रही लाइन से टकराया और करंट से प्रभुलाल गुप्ता की मौत हो गई। मामला विदिशा का है। उज्जैन से लिखा है कि आसाराम की तबीयत बिगड़ी है। पंचकर्म करने नहीं पहुंचे अस्पताल। दिग्विजयसिंह की पदयात्रा में बच्चों ने नारे लगाए तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने नोटिस थमा दिया है। नईदुनिया बता रहा है कि रानी सराय में पेड़ काटेंगे, लालबाग में बचेंगे। बड़ी खबर है, जिसमें अदालत भी है। क्या, कुछ हो रहा है, सब छपा है। पत्रिका के मुताबिक, रीगल तिराहे पर पंद्रह में से चौदह दिन हवा खराब रहती है। तस्वीर के साथ है कि हर शाम ट्रैफिक जाम इंदौर की पहचान है। दैनिक भास्कर ने इंदौर से जानकारी दी है कि सेमीकंडक्टर समिट में पंद्रह हजार करोड़ रुपए के निवेश आए हैं और चौदह हजार से ज्यादा रोजगार मिलने की उम्मीद है। जब भी इस तरह की समिट होती है, ऐसे ही आंकड़े दिए जाते हैं, लेकिन आगे क्या होता है,