चारदीवारी से खुले आसमान तक!

· Indore

चारदीवारी से खुले आसमान तक!

जिस लड़की के स्कूल जाने पर सवाल उठाए, आज उसी के दरवाजे पर महिलाएं हुनर सीख रहीं, घर से शुरू किया बैग का कारोबार, आज हर दिन दो हजार ऑर्डर हैं।शाहीन के पिता प्रोफेसर, मां और भाई के साथ बचपन गांव में गुजरा। शादी के बाद शाहीन दिल्ली आ गईं। पति डिजाइनर थे। शाहीन के गांव में लड़कियां पांचवीं तक पढ़ लें तो बहुत था। हाईस्कूल करीब पांच किलोमीटर दूर था और वहां तक पहुंचने वाली शाहीन पहली लड़की थीं। रोज पैदल जातीं।

शाहीन पढ़ाई के साथ खेलकूद में आगे रहतीं। मेडिकल की तैयारी शुरू कर दी। मगर शादी हो गई और शाहीन दिल्ली आ गईं। पति ने पढ़ाई और काम का रास्ता बंद नहीं किया। बच्चे हुए, घर की जिम्मेदारियां बढ़ीं, उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। दिल्ली में पढ़ाने लगीं। सुबह स्कूल, दोपहर में घर और फिर ट्यूशन।

कोरोना में स्कूल और बाजार बंद थे। बात निकली कि कुछ अपना किया जाए। उस इलाके में बैग बनते थे। पति डिजाइन समझते थे।

करीब दो लाख रुपये से काम शुरू हुआ। न कोई दुकान थी, न बड़ा दफ्तर। दो-चार ऑर्डर से शुरुआत हुई, लेकिन एक महीने में धड़ाधड़ ऑर्डर आने लगे।

परिवार ने चीन और कोरिया की डिजाइन देखना शुरू की। अपनी समझ जोड़ी और बैग बनवाए। जो बैग हजार रुपये से ज्यादा का था, वह करीब डेढ़ सौ से पौने दो सौ रुपये में तैयार हो गया। कीमत 399 रुपये रखी। इसके बाद ऑर्डर ऐसे बढ़े कि

घर में जगह कम पड़ गई। दो सौ, पांच सौ और फिर हजार ऑर्डर रोज आने लगे। आज करीब दो हजार तक है। महीने की बिक्री एक से डेढ़ करोड़ रुपये के बीच रहती है। बैग अलग-अलग इकाइयों में बनते हैं, जबकि पैकिंग और ऑर्डर संभालने का बड़ा हिस्सा घर से जुड़ा हुआ है।

यह कहानी सिर्फ बढ़ती बिक्री और करोड़ों के आंकड़े की नहीं है। इसके पीछे बिना छुट्टी के दिन, रात तक चलता काम, लौटते सामान का नुकसान, पैकेट से होने वाली चोरी, डिजाइन की नकल और गिरती कीमतों की मार भी है।

शाहीन का कोई बैग बाजार में चल जाता तो कुछ ही दिनों में उसकी नकल तैयार हो जाती। जिस बैग को वह 399 रुपये में बेच रही थीं, वैसा ही बैग कुछ लोग 199 रुपये में बेचने लगे। कीमत की लड़ाई में उतरने का मतलब था अपने कारोबार को धीरे-धीरे नुकसान में धकेलना। शाहीन ने पुराने डिजाइन के पीछे भागने के बजाय नए बैग तैयार करने शुरू कर दिए। ऐसा भी समय आया, जब थकान ने हिम्मत पर कब्जा कर लिया। एक दिन कई कर्मचारी काम पर नहीं आए। बोझ शाहीन पर आ गया। उसी दिन उन्होंने मन बना लिया कि अब कारोबार नहीं बढ़ाना है।

उसी समय एक महिला पहुंची। परिवार किराए के मकान में रहता था। किराया देने के पैसे नहीं थे और मकान मालिक घर खाली करवा रहा था। महिला को काम चाहिए था। शाहीन ने उसे काम पर रख लिया। कुछ पैसा पहले दे दिया और उसी दिन फैसला बदल दिया। उन्हें समझ आया कि कारोबार बढ़ाना सिर्फ अपनी कमाई नहीं, किसी दूसरे घर को टूटने से बचाना भी है।

आज कई ऐसी महिलाएं काम करती हैं जो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं या बच्चों को अकेले पाल रही हैं। कभी बच्चों को अक्षर सिखाने वाली अब महिलाओं को पैकिंग और कारोबार सिखाती है। शाहीन का शिक्षा से शुरू हुआ सफर रोजगार तक पहुंचा और फिर रोजगार वापस उसी बस्ती की जरूरतमंद महिलाओं के लिए लौट गया।

शाहीन की कामयाबी के पीछे परिवार है। पति ने डिजाइन संभाला, लड़के ने ऑनलाइन बिक्री, लड़की फैसलों में साथ बैठी और भाई ने भी कारोबार की दुनिया में रास्ता बनाया। यह किसी अकेली महिला की जादुई छलांग नहीं थी। यह मेहनत, परिवार के भरोसे और हर दिन नया सीखने का नतीजा था।

जिस लड़की के स्कूल जाने पर कभी गांव ने सवाल उठाए थे, आज उसी के दरवाजे पर महिलाएं पैरों पर खड़े होने का रास्ता पूछने आती हैं। डेढ़ करोड़ रुपये महीने की बिक्री है, लेकिन असली कमाई वे घर हैं, जहां उनके दिए काम से किराया भरता है, चूल्हा जलता है और किसी महिला को पहली बार लगता है कि वह किसी पर बोझ नहीं है।