जंग से सूनी गलियां!

· Indore

जंग से सूनी गलियां!

जंग मध्य-पूर्व में चल रही है, लेकिन चिंता हिमाचल के छोटे से गांव के दुकानदारों की है। किसी को गेस्ट हाउस की चिंता है तो किसी को कैफे की। यह धर्मकोट है। कांगड़ा जिले में मैक्लोडगंज के पास बसा वह गांव, जहां इजराइली इतने आते हैं कि पहचान ही ‘मिनी इजराइल’ बन गई। अब मेहमानों की आवाजाही कम है और पुलिस की निगरानी है। दुकानों पर हिब्रू में लिखे बोर्ड हैं। बेकरियों में इजराइली मेहमानों की पसंद की ब्रेड बनती है। दुकानदारों के मुताबिक, इन मेहमानों से उनके अच्छे रिश्ते हैं और रोजी-रोटी भी जुड़ी है इसलिए इजराइल में हालात बिगड़ने की खबर सिर्फ विदेश की खबर नहीं रह जाती।

धर्मकोट की पहचान उसकी पुरानी जिंदगी से अलग है। यह कभी गद्दी समुदाय का गांव था, जहां पशुपालन, छोटी खेती और मजदूरी से घर चलते थे। विदेशी यात्री बढ़ने के साथ घरों में कमरे किराए पर मिलने लगे और कैफे खुल गए। कुछ ने हिब्रू भी सीख ली। आज कई परिवारों की कमाई इजराइलियों से जुड़ी है। कारोबार की खास बात मेहमानों का लंबे समय तक ठहरना है। यूरोप और अमेरिका से आने वाले पीठ पर सामान लेकर घूमते हैं और एक जगह समय बिताते हैं। कुछ दिन घूमकर चले जाने वाले और कई हफ्ते ठहरने वाले मेहमान से होने वाली कमाई में फर्क होता है। लंबा ठहराव कमरे के साथ रोज के खाने और दूसरी सेवाओं का काम भी बनाए रखता है।

ये सिर्फ खाने और पहाड़ देखने नहीं आते। वृंदावन दास की कार्यशाला में गहने बनाना सिखाया जाता है। आदित्य सिंह भी विदेशी यात्रियों को आभूषणों के डिजाइन बनाना सिखाते हैं। संगीत की कार्यशालाएं भी हैं। वहां इजराइली युवक बांसुरी सीखता मिला। इन छोटी कक्षाओं के खाली होने का असर सीधे सिखाने वालों की कमाई पर पड़ता है। इजराइली युवाओं के भारत आने का पुराना सिलसिला सैन्य सेवा के बाद की यात्राओं से जुड़ा है। धर्मकोट की पहचान इजराइली तक नहीं है। इसके पास तुशिता ध्यान केंद्र है। यहां बौद्ध धर्म को समझाया जाता है, जो सभी के लिए खुला है। कुछ दुकानों पर फोटो और वीडियो लेने से मना करने वाले बोर्ड हैं। सभी भारतीय पर्यटकों को जिम्मेदार ठहराना या गिरावट की एक ही वजह तय करना सही नहीं होगा।

धर्मकोट में यहूदी समुदाय का चबाड हाउस भी है। वहां प्रार्थना और सामुदायिक मेलजोल होता है। धर्मशाला में चबाड केंद्र की शुरुआत 2000 में हुई थी। ऐसे केंद्र यात्रियों को धार्मिक नियमों के मुताबिक भोजन और अपने समुदाय से जुड़ने की सुविधा देते हैं। यह गांव को बार-बार लौटने लायक ठिकाना बनाने वाले संबंधों का हिस्सा है। धर्मकोट में किसी इजराइली नागरिक ने हिफाजत की मांग नहीं की है। फिर भी गांव की गलियों में दिन में दो बार गश्त की जिम्मेदारी दी गई है और यहां ठहरे विदेशी नागरिकों का ब्यौरा रखा है। धर्मकोट की परेशानी दो तरफ से है। दूर की जंग यात्रा मुश्किल बनाती है और गांव की बढ़ती भीड़ उसके सुकून पर असर डालती है। जिन परिवारों ने मेहमानों के लिए कमरे बनाए, खाना बनाना सीखा और हुनर सिखाने का काम शुरू किया, उनके लिए दोनों बातें कमाई से जुड़ी हैं। पहाड़ अपनी जगह हैं। सवाल उन लोगों का है, जिनकी रोजी पहाड़ देखने आने वालों से चलती है।