70 रातों का दर्द

· Indore

70 रातों का दर्द

फिल्मी दुनिया में कुछ लोग कामयाबी से पहचाने जाते हैं, कुछ विवादों से और कुछ गिर कर उठने की ताकत से। विक्रम भट्ट तीसरी किस्म के हैं। बड़े नामों के साथ काम, आमिर खान से लेकर अक्षय कुमार और अजय देवगन तक का सफर। लंबे दौर की नाकामियां, बड़े सितारों के इंतजार से थककर अपना रास्ता चुनना और फिर डर को ही अपना हथियार बना लेना। यही वजह है कि उनकी कहानी किसी सीधी सड़क जैसी नहीं लगती। यह कभी चढ़ाई है, कभी खाई है, कभी धुंध है और कभी अचानक सामने खुलता हुआ रास्ता।

उनके भीतर एक अजीब सा जिद्दीपन रहा है। वह जिद जो इंसान को झुकने नहीं देती और कभी-कभी अकेला भी कर देती है। फिल्मी दुनिया में जहां हर आदमी किसी बड़े दरवाजे के बाहर खड़ा रहना सीख जाता है, विक्रम भट्ट ने एक दिन यह तय कर लिया कि वह किसी बड़े स्टार की मेकअप वैन के बाहर जिंदगी नहीं गुजारेंगे। यह फैसला आसान नहीं था। बड़े सितारों से दूर जाना मतलब आसान पैसा, बड़ी चर्चा और सुरक्षित रास्ता छोड़ना, लेकिन उन्होंने डर को कारोबार नहीं, अपनी पहचान बना लिया। 1920 जैसी फिल्में उसी जिद से निकलीं। दुनिया ने चाहे हॉरर को हल्का समझा हो, लेकिन डर को महसूस किए बिना डर बनाया नहीं जा सकता। यह बात वही आदमी समझ सकता है जिसने अपने अंदर के डर को जिंदा रखा हो।

लेकिन विक्रम भट्ट की कहानी सिर्फ फिल्मों की नहीं है। उनकी जिंदगी में वह दौर भी आया, जब बाहर से सब कुछ चमकदार दिख रहा था और अंदर जेब खाली थी। यह सोचिए, एक तरफ आमिर खान की फिल्म डायरेक्ट करने वाला आदमी, दूसरी तरफ सुष्मिता सेन जैसी मिस यूनिवर्स के साथ नाम जुड़ा हुआ। बाहर से तस्वीर ऐसी कि जैसे जिंदगी शाही अंदाज में चल रही हो लेकिन असलियत यह कि जेब में पैसे नहीं थे। हालत ऐसी कि खुद टूटने की बात आए तो जहर खरीदने तक के पैसे नहीं। यह लाइन सिर्फ गरीबी की बात नहीं करती, यह फिल्मी चमक के झूठे चेहरे को खोल देती है।

सुष्मिता सेन के साथ उनका रिश्ता उस दौर में बहुत चर्चा में रहा। फिल्मी दुनिया और आम लोग दोनों ने उस कहानी को अपने-अपने चश्मे से देखा। किसी ने इसे ग्लैमर समझा, किसी ने स्कैंडल, किसी ने बड़े नामों वाली कहानी लेकिन इस रिश्ते के पीछे एक आदमी की असल हालत बहुत कम लोगों ने देखी। वह आदमी अंदर से संघर्ष कर रहा था। नाम था, चर्चा थी, मोहब्बत थी लेकिन स्थिरता नहीं थी। इश्क जब खाली जेब के साथ आता है तो वह शेरो-शायरी नहीं रहता, वह एक भारी जिम्मेदारी बन जाता है। आदमी बाहर मुस्कुराता है लेकिन भीतर यह डर बैठा रहता है कि कहीं सब कुछ हाथ से निकल न जाए। विक्रम भट्ट की जिंदगी में यह दौर इसी दोहरी आग जैसा था। एक तरफ मिस यूनिवर्स से जुड़ा नाम और दूसरी तरफ अपनी टूटती हुई जमीन।

फिल्म दुनिया का सबसे बड़ा धोखा यही है कि यहां आदमी की हालत उसके कपड़ों, पार्टियों और नामों से नापी जाती है। जो आदमी बड़े लोगों के बीच दिखता है, लोग मान लेते हैं कि वह बड़ा आदमी हो गया लेकिन सच यह है कि कई बार सबसे चमकदार तस्वीर के पीछे सबसे खाली जेब होती है। विक्रम भट्ट के उस दौर में यही खुरदुरी सच्चाई दिखती है। बाहर दुनिया उन्हें उस रिश्ते से देख रही थी, भीतर वह अपने अस्तित्व से लड़ रहे थे। आदमी जब मोहब्बत में हो और कंगाल भी हो तो उसका दर्द दोहरा हो जाता है। वह सामने वाले को भी खोने से डरता है और खुद को भी।

इस बीच उनकी जिंदगी एक कानूनी मामले में उलझ गई। आरोप लगा कि एक डॉक्टर से करोड़ों रुपये लेकर उनकी दिवंगत पत्नी पर फिल्म बनाने का वादा पूरा नहीं किया गया। विक्रम भट्ट इस आरोप को बेबुनियाद मानते रहे और मामला अदालत में पहुंच गया। सच क्या है, यह अदालत तय करेगी लेकिन इसी केस ने उन्हें जेल की सलाखों तक पहुंचा दिया। एक फिल्मकार, जो दूसरों की कहानियां बनाता था, अचानक खुद एक ऐसी कहानी के बीच खड़ा था जहां स्क्रिप्ट उसके हाथ में नहीं थी।

उदयपुर जेल के करीब 70 दिन। यह कोई फिल्मी सेट नहीं था जहां निर्देशक कट बोलकर मंजर बदल दे। यह असली बैरक थी। कभी 60 लोग, कभी 80, कभी 90 लोग। वही सांसें, वही बदन की थकान, वही जमीन, वही ठंड, वही इंतजार। बाहर वाला विक्रम भट्ट वहां फिल्मकार नहीं रह गया था। वहां वह सिर्फ एक बीमार इंसान था, जिसे रात में ठंड लगती थी, बुखार चढ़ता था, जिस्म कांपता था और आंखों के सामने यह डर तैरता था कि शायद अस्पताल तक भी न पहुंच पाए।

उन्हें पहले से ऑटोइम्यून बीमारी की तकलीफ थी। जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द रहता था। जेल की जमीन पर सोना आसान नहीं था। दिसंबर-जनवरी की ठंड, करवट बदलते ही हड्डियों में चुभता दर्द और ऊपर से पीलिया। रात में बुखार ऐसा आता कि बैरक के साथी अपने कंबल निकालकर उनके ऊपर डाल देते। तीन-तीन, चार-चार कंबल के बाद भी जिस्म कांपता रहता। एक आदमी जिसने परदे पर दूसरों को डराया, वह खुद उस रात डर के सामने पड़ा था। वहां कोई कैमरा नहीं था। कोई तालियां नहीं थीं। कोई स्टारडम नहीं था सिर्फ सांस थी और सांस बचाने का संघर्ष। जेल की कहानी का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा यह है कि जिस जगह को हम सिर्फ सजा, गुनाह और डर से जोड़कर देखते हैं, वहीं विक्रम भट्ट को इंसानियत मिली। बैरक के लोग उनका खाना ला देते, कपड़े संभालते, बीमारी में खयाल रखते। उन्हें भीष्म पितामह कहकर बैठा देते और रात में हॉरर कहानी सुनाने की फरमाइश करते। यह तस्वीर अजीब है। बाहर की फिल्मी दुनिया में लोग फोन उठाने से पहले फायदा-नुकसान सोचते हैं और जेल की बैरक में अनजान लोग अपनी रजाई उतारकर किसी बीमार आदमी पर डाल देते हैं। जिंदगी कभी-कभी सबसे गलत समझी जाने वाली जगहों पर सबसे सही लोग दिखा देती है।

कानूनी मामला अपनी जगह है और अदालत अपनी जगह। आरोप, सफाई, शक और इंतजार, यह सब अभी अपने रास्ते चल रहे हैं लेकिन इस पूरी कहानी का इंसानी पहलू अलग है। जेल से लौटे विक्रम भट्ट सिर्फ एक कानूनी मामले से लौटे आदमी नहीं दिखते बल्कि ऐसे इंसान दिखते हैं जिसने एक और हिंदुस्तान देखा। वह हिंदुस्तान जो इंस्टाग्राम पर नहीं रहता, जो बड़ी पार्टियों में नहीं दिखता, जो अखबार की सुर्खियों में सिर्फ अपराध बनकर आता है लेकिन भीतर से दोस्ती, दर्द और भरोसे से भरा भी हो सकता है। उनकी जिंदगी में रिश्तों का हिसाब भी इसी दौर में खुला। बुरा समय आदमी को यह बता देता है कि कौन सिर्फ साथ दिखता था और कौन सच में साथ है। कुछ लोगों ने दूरी बनाई, कुछ चुप रहे, कुछ ने खबर ली लेकिन विक्रम भट्ट की सोच यहां भी कड़वाहट में पूरी तरह नहीं बदली। शायद उम्र और ठोकरें आदमी को यह सिखा देती हैं कि हर किसी से एक जैसा साथ मांगना भी गलत है। फिल्मी दुनिया में हर रिश्ता दोस्ती नहीं होता। कुछ रिश्ते काम के होते हैं, कुछ आदत के, कुछ नाम के और कुछ सचमुच दिल के। बुरा समय इन सब पर से नकाब हटा देता है।

विक्रम भट्ट की कहानी में एक और बात बार-बार लौटती है, आदमी अपने काम से बड़ा होता है। हॉरर फिल्म बनाने वाला आदमी सिर्फ हॉरर फिल्मकार नहीं होता। फ्लॉप फिल्म देने वाला आदमी सिर्फ नाकाम डायरेक्टर नहीं होता। जेल जाने वाला आदमी सिर्फ आरोपी नहीं होता। इश्क में टूटने वाला आदमी सिर्फ अफेयर की खबर नहीं होता। हर इंसान अपने काम, अपनी गलती, अपनी खबर और अपनी छवि से बड़ा होता है। यही बात विक्रम भट्ट की जिंदगी बार-बार समझाती है। उनके हिस्से में शोहरत आई लेकिन उसके साथ ताने भी आए। इश्क आया लेकिन उसके साथ गलतफहमियां भी आईं। पैसा आया लेकिन खाली जेब की शर्म भी आई। फिल्में आईं लेकिन नाकामी का लंबा अंधेरा भी आया। जेल आई लेकिन वहीं कुछ अनजान लोगों का प्यार भी मिला। यही जिंदगी है। यहां हर रोशनी अपने पीछे एक साया लेकर चलती है और हर अंधेरा अपने भीतर कहीं न कहीं एक छोटा सा चिराग भी छुपाए रहता है।

विक्रम भट्ट की जिंदगी को सिर्फ उनकी फिल्मों, अफेयर, जेल या विवाद से समझना जल्दबाजी होगी। असल कहानी उस आदमी की है जो बार-बार गिरा लेकिन अपने डर को बेचकर नहीं, उसे समझकर आगे बढ़ा। जिसने खाली जेब में भी नाम का बोझ उठाया, जेल की ठंड में भी सांस बचाई और लौटकर यह साबित किया कि आदमी की असली कहानी उसकी कामयाबी में नहीं, उसके बच जाने में छुपी होती है। विक्रम भट्ट की जिंदगी का सबसे बड़ा सीन शायद किसी फिल्म में नहीं है, वह उस बैरक में है जहां एक बीमार आदमी कांप रहा था और फिर भी अंदर कहीं जिंदगी से हार मानने को तैयार नहीं था। कुछ लोग डर की फिल्में बनाते हैं, विक्रम भट्ट ने डर के अंदर रहकर जिंदगी की असली पटकथा लिखी।