‘हम ही हम हैं तो क्या हम हैं!’

· Indore

‘हम ही हम हैं तो क्या हम हैं!’

फिल्मी लेखक, गीतकार जावेद अख्तर जब खुद को नास्तिक बताते हैं तो सिर्फ यहीं नहीं रुकते हैं। धर्म की कमियां निकालते हैं और धज्जियां बिखेरते हैं। शबाना आजमी ने हाल ही में कहा कि मुसलमान हैं, लेकिन धार्मिक नहीं हैं। नमाज नहीं पढ़ती हैं और ना कभी कोई दूसरा धार्मिक काम किया है, पर ईद पसंद है, उर्दू ज़बान, शरारा और खाना भी, लेकिन धर्म से कोई खास वास्ता नहीं है। पिता कैफी आजमी नास्तिक थे। मां शौकत आजमी कुछ धार्मिक तरीकों को मानती थीं, लेकिन धर्म को लेकर सख्त नहीं थीं।

बताती हैं, घर में कभी-कभार ‘माशाअल्लाह’ और ‘इंशाअल्लाह’ जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं, जिस पर जावेद अख्तर को ऐतराज रहता है। अगर कोई हर समय ‘प्रभु जी की मर्जी’ कहता रहे, तो कैसा लगेगा? मेरे लिए शब्द उनकी भाषा और सांस्कृतिक परिवेश का हिस्सा हैं। जो ईश्वर को मानते हैं, खुद को धार्मिक बताते हैं और कहीं आस्था रखते हैं, उनसे हमदर्दी है कि सबको अपने तरीके से जीने की आजादी है।

जावेद अख्तर से पूछती हूं कि अगर किसी को धर्म का पालन करने से सुकून मिलता है तो ऐसा करने नहीं देना चाहिए? किसी की भावनाओं को ठेस क्यों पहुंचाना? जावेद का जवाब होता है कि धार्मिक उन्हें ठेस पहुंचाते हैं। क्या नास्तिक को भावनाएं आहत होने की शिकायत करने का अधिकार नहीं है? दोनों के अपने नजरिए हैं और यहीं से बात शुरू होती है कि जावेद अख्तर को बात कहने का हक है, लेकिन क्या साबित करने के लिए किसी दूसरे पर हमला करना जरूरी है?

जावेद अख्तर का निशाना अकसर मजहबी, उनकी आस्था पर होता है और उसका मजाक बनाने में हमेशा आगे रहते हैं। मौलाना से बहस कर बैठे थे। पूरी तैयारी के साथ नहीं थे, जिसके बाद काफी कुछ उलटा-पुलटा हो गया। बाद में कबूल किया है कि तबीयत ठीक नहीं थी और अगर मौलाना को लगता है कि जीत हासिल कर ली, तो ठीक है। नास्तिक हैं तो आपको लाइसेंस नहीं मिल जाता कि धार्मिक हैं, उनका मजाक बनाएं।

अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब अपनी बात कहना है, दूसरों पर सवाल लगाना है, लेकिन माखौल उड़ाना नहीं है। वैसे ही धार्मिक बिरादरी भी नास्तिकों पर हमलावर नहीं हो सकती है। उसके पास जैसे ही तर्क खत्म होते हैं, आस्तीन चढ़ा लेते हैं, मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं और भावनाएं भी उनकी फौरन आहत होने लगती हैं, जबकि किसी धर्म को अगर मान रहे हैं तो उसको मानने की वजह होना चाहिए और हर बात का जवाब भी। अगर जवाब नहीं है तो फिर भेड़चाल ही है कि बाप ने जिस धर्म को अपनाया था, उसको अपना लिया। समझना तो पड़ेगा कि आखिर जिस धर्म को मान रहे हैं, क्या है, क्यों है, कैसे आया है, क्या चाहता है और क्या उसका नजरिया है और क्या उसके पास हर सवाल का जवाब है?

इस मामले में जावेद अख्तर के साथ दोहरी दिक्कत है। कभी मुसलमान के निशाने पर आ जाते हैं तो कभी हिंदू उनको कठघरे में खड़ा कर देते हैं। किसी का शेर है- ज़ाहिद-ए-तंग-नज़र ने मुझे काफ़िर जाना/ और काफ़िर ये समझता है मुसलमान हूं मैं। गुंजाइश हमेशा रहनी चाहिए कि बातचीत होती रहे, विचार सामने आते रहें, तर्क-वितर्क हों और एक-दूसरे के विचारों पर प्रहार भी हो। वैसे यहां फरहान अख्तर का जिक्र किया जा सकता है, जिनका कहना था कि नास्तिक हूं, लेकिन किसी को घेरता नहीं हूं और ना किसी पर तंज करता हूं। उनका अपना तरीका है, मुझे उससे कोई तकलीफ नहीं है। क्या ईश्वर को नहीं मानने वाला ज्यादा समझदार हो जाता है और जो मानता है, कम अक्ल? अगर ऐसा है तो दुनिया के तमाम धार्मिक लोग गलत हैं और नास्तिक ही सही हैं। फिर जो धर्म पर यकीन करते हैं, उनके पास साबित करने के लिए कुछ नहीं होता, क्योंकि मामला आस्था और यकीन का है, सबूत का नहीं है। नास्तिक सबूत मांगते हैं, धार्मिक दे नहीं पाते हैं, क्योंकि सिर्फ भरोसा होता है उनके पास। किसी विचार से सहमत या असहमत होने का मतलब नहीं है कि दूसरे विचार को मानने वाला गलत है।

आस्था और अनास्था इंसान के दो हाथ हैं। कोई तजुर्बे से ईश्वर तक पहुंचता है तो कोई तर्क से नकार देता है, लेकिन बात तो दोनों की सुनी जा सकती है। खारिज करने से तो बात नहीं बनने वाली है। जावेद अख्तर के पास शब्दों की ताकत है, बात कहने का हुनर है और बहस करने का लंबा तजुर्बा है। उन्हें पता है कि लड़ाई लंबी है, इसलिए उस जगह वार करते हैं, जहां से धार्मिक बिरादरी तिलमिला उठती है। किसी धर्म में कमियां दिखाई देती हैं तो सवाल होना चाहिए। किसी धार्मिक रीति-रिवाज या तौर-तरीके पर ऐतराज है तो विरोध किया जा सकता है, लेकिन तरीका क्या होगा? फिर अगर कोई धर्म पर सवाल लगा रहा है तो उसे अधर्मी कहकर पत्थर तो नहीं मारे जा सकते हैं। क्या हर धार्मिक अंधविश्वासी होता है?

जब बात अंधविश्वास की आती है तो नास्तिक यहीं से बात शुरू करते हैं कि ईश्वर ही सबसे बड़ा अंधविश्वास है। क्या सबूत है? क्या कभी देखा है? क्या सबकी मदद करता है? क्या भूकंप उसकी मर्जी से आते हैं? जहां मासूम मारे जाते हैं तो क्या उसकी मर्जी से मारे जाते हैं? यही सब बातें जावेद अख्तर करते हैं और सामने से कोई जवाब नहीं आ पाता, क्योंकि वहां तो आस्था चलती है और कहा जाता है कि सब करने वाला ईश्वर है और जब उसे साबित करने की बारी आती है तो मामला ऊपर-नीचे हो जाता है।

दरअसल, परेशानी तब शुरू होती है, जब सोच को ही आखिरी सच मान लिया जाता है। फिर सामने वाले को समझने की कोशिश खत्म हो जाती है और उसे गलत साबित करना मकसद बन जाता है। बहस विचारों की जगह कुछ खास लोगों पर होने लगती है। तर्क की जगह तंज ले लेते हैं और असहमति की जगह अपमान आ जाता है। यही मोड़ है, जहां बातचीत का रास्ता बंद होने लगता है, जबकि समाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि अलग-अलग विचार रखने वाले एक-दूसरे को सुनें, सवाल करें और जवाब दें। किसी की बात गलत लगे तो उसका जवाब दिया जाए, ना कि बोलने वाले को ही बेवकूफ बता दिया जाए, मूर्ख और जाहिल कहा जाए।

शबाना आजमी ने समझदारी से बात कही है कि जो ईश्वर को मानते हैं, उन्हें अपने तरीके से जीने का अधिकार है। खुद धार्मिक नहीं हैं, लेकिन ईद, उर्दू और मुस्लिम रीति-रिवाज से जुड़ी चीजों को पसंद करती हैं। लोकतंत्र सिर्फ सरकार चुनने और बात कहने का नाम नहीं है। अलग-अलग विचारों के साथ रहने का तरीका है।

किसी को ईश्वर में यकीन रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और किसी को ईश्वर में आस्था नहीं रखने पर कठघरे में खड़ा करना भी गलत है। जावेद अख्तर तो हमेशा सरशार सैलानी का शेर सुनाते हैं- चमन में इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू से बात बनती है/ हम ही हम हैं तो क्या हम हैं, तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो। फिर क्यों इस चमन को धार्मिक लोगों से आजाद करना चाहते हैं और नास्तिक ही रहें, ऐसा क्यों सोचते हैं!