चैंपियन अलेक्जेंडर ज्वेरेव की कहानी

न्यू यॉर्क। यूएस ओपन जीतने के बाद जब अलेक्जेंडर ज्वेरेव के लिए तालियां बज रही थीं, तब उनकी आंखें नम थीं। कहा कि इन चाहने वालों में सबसे अहम शख्स… मेरी मां मौजूद नहीं हैं। वो कभी मुझे खेलती नहीं देखतीं… भावुक हो जाती हैं। चार साल का था, तो शुगर हो गई। डॉक्टरों ने कहा कि ज्यादा खेलना, दौड़ना या शरीर पर दबाव डालना खतरा हो सकता है। संभल कर ही गुजारना पड़ेगी।
उस बीमार बच्चे को देख सब दया कर रहे थे, लेकिन मां इरिना ज्वेरेव के तेवर सख्त थे। उन्होंने कहा कि ये बीमारी मेरे बेटे की उड़ान का फैसला नहीं करेगी। उसे जो खेलना है… खेलेगा, दौड़ेगा, वो सब कुछ करेगा, जो दूसरे बच्चे कर रहे हैं। भले ही इस संघर्ष में उसकी जान ही क्यों न चली जाए।
मैंने टेनिस चुना… पांच साल का था और रैकेट थाम लिया। मुझसे पहले मां जागती थीं। अलॉर्म घड़ी की क्या मजाल कि मां के जागने से पहले बज जाए। जब तक मुमकिन था, वो मेरे साथ दौड़ती थीं, खेलती थीं, खाना-पीना, दवाई… हर चीज का खयाल रखती थीं। जब कभी मैं कमजोर पड़ता, तो नाराज होती थीं। वो मुझे लड़ता हुआ देखना चाहती थीं। मैं जल्द उसकी बात समझ गया। खुद से वादा किया कि अब रुकना नहीं है। अब मुकाम हासिल हुआ है। अपनी बीमारी के बारे में पहले भी बात की है, लेकिन मां के संघर्ष को पहली बार आम कर रहा हूं।
ज्वेरेव ने कहा कि मेरी तरह हर बीमार बच्चा खुशनसीब नहीं है कि जर्मनी जैसे ताकतवर देश में पैदा हुआ हो, जहां इलाज के इंतजाम पुख्ता हों। दुनिया भर में कई बच्चे हैं, जिन्हें रहनुमा और इलाज की जरूरत है। मेरा फाउंडेशन पांच साल से ऐसे बच्चों की मदद कर रहा है। किसी एक के चेहरे पर भी मुस्कान देखता हूं, तो खुश होता हूं कि कुछ दे पाया हूं। ज्वेरेव के इस भावुक भाषण की चर्चा दुनिया भर में हो रही है। उनकी एक और क्लिपिंग आम हो रही है, जिसमें मैच के दौरान वे इंसुलिन लगाते दिख रहे हैं।