संदेह दूर करने की कोशिश...!

· Indore

संदेह दूर करने की कोशिश...!

महिलाएं बखूबी काम कर रही हैं, लेकिन संदेह दूर ही नहीं होते। शानदार कहानी, चौंकाने वाली सिनेमैटोग्राफी और दमदार अभिनय के साथ सीरीज़ "मैडम इंस्पेक्टर’ का अंत भी अलग मोड़ पर होता है। दो व्यक्तियों के जीवन में एक जैसी घटना हो सकती है, लेकिन एक ही घटना के अलग-अलग मतलब किसी व्यक्ति के मन, व्यक्तित्व, करियर पर किस तरह असर करते हैं, सीरीज़ विचार देती है।

इंस्पेक्टर चित्रा की माँ उसे और उसकी बहन को बचपन में ही छोड़कर चली गई थी। उस समय दोनों बहनें स्कूल में पढ़ती थीं। पिता ने उन्हें समझाया कि उनकी माँ का कोई दोष नहीं था, बल्कि वे ही अपनी माँ के काबिल नहीं थे। यह बात दोनों लड़कियों को काबिल बनाने की दिशा में ले जाती है। कातिल की माँ भी उसे और उसके भाई को बचपन में छोड़कर चली गई थी। उसके पिता ने बच्चों को बताया कि उनकी माँ बुरी थी। हताश पिता ने बच्चों के साथ आत्महत्या करने की कोशिश की।

इस घटना में पिता और भाई की मृत्यु हो गई, लेकिन कातिल बच गया। उसे कभी सच्चाई पता ही नहीं चली कि पिता उसकी माँ को पता था। वह जीवन भर माँ से नफरत करता रहा और धीरे-धीरे उन सभी महिलाओं से भी नफरत करने लगा, जो दूसरा विवाह करना चाहती थीं। इसी नफरत ने उसे सीरियल किलर बना दिया।

सीरीज़ की खूबी यह है कि वह अपराध के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करती है। किसी स्त्री का विवाह टूट जाने का मतलब यह नहीं कि उसके जीवन की संभावना खत्म हो गई है। क्या उसे दोबारा प्रेम करने, घर बसाने और नई शुरुआत का अधिकार नहीं है? सीरीज़ सामाजिक मानसिकता के इसी पहलू को सामने लाती है।

सात एपिसोड की कहानी उन महिलाओं की रहस्यमय मौत से शुरू होती है, जो दोबारा विवाह करने जा रही हैं। पहली घटना से ही चित्रा को संदेह होता है कि कोई महिला अपनी मर्ज़ी से विवाह करने जा रही हो, तो वह पहली ही रात आत्महत्या क्यों करेगी? उसे लगता है कि इन मौतों के पीछे कोई साजिश है।

चित्रा का संदेह मीडिया तक पहुँच जाता है। मीडिया सवाल उठाने लगती है और उसका वरिष्ठ अधिकारी, जो पहले से ही महिला होने के कारण उससे हिकारत करता है, उसे निलंबित कर देता है। घर का माहौल भी उसके अनुकूल नहीं है। उसका परिवार उसके काम का सम्मान नहीं करता, हालाँकि उसका पति उसका साथ देता है। कुछ महीने पहले हुई ऐसी ही एक हत्या पर चित्रा का विश्वास और पक्का हो जाता है कि नवविवाहिताएँ आत्महत्या नहीं कर रही हैं, बल्कि हत्या की जा रही है।

जाँच के लिए एक विशेष दल बनाया जाता है और चित्रा को उसमें शामिल किया जाता है। दल प्रमुख को लगता है कि महिला इंस्पेक्टर की मौजूदगी उनके लिए बोझ जैसी है। एक दृश्य में जब चित्रा से सवाल पूछा जाता है, तो वह अपने बैग में कुछ तलाशने लगती है। उन्हें लगता है कि वह बैग से मेकअप किट निकालेगी। चित्रा नोटबुक निकालती है और उन मौत को आपस में जोड़ने वाली कड़ी का पता लगाने के लिए तैयार किए गए नोट्स साझा करती है।

संदीप्ता सेन ने चित्रा के चरित्र को बारीकी से पकड़ा है। अपराधी का पीछा करने वाली पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि अपने भीतर भी कई संघर्ष सँभाल रही है। निरंजन मंडल का अभिनय भी कहानी के रहस्य को गहराने में मदद करता है। दोनों के चरित्रों का तनाव कथा आगे बढ़ाता है।

निर्देशन और छायांकन में माहौल बनाने की कोशिश है। सिनेमैटोग्राफी कहानी के तनाव को उभारती है, जबकि संगीत कई दृश्यों के असर बढ़ाता है। कहानी की गति बनाए रखती है और जिज्ञासा बनी रहती है। निर्देशक निर्झर मित्रा ने इस क्राइम थ्रिलर में दिलचस्प कहानी के साथ गंभीर विषयों को भी उठाया है। महिलाओं के जीवन और उन पर काबू पाने की मानसिकता हिंसक रूप ले सकती है, यह कहानी का खास है। अपराध-कथाओं में मनोवैज्ञानिक गहराई और रोमांच के बीच संतुलन जरूरी है। कहीं-कहीं जाने-पहचाने थ्रिलर फॉर्मूलों की छाया भी है। कुछ प्रसंगों को अधिक स्वाभाविक बनाते तो पात्रों की जटिलता और प्रभावशाली हो सकती थी। चित्रा के व्यक्तिगत संघर्ष और उसकी पुलिसिया जाँच के बीच भी कुछ जगह अधिक सहज तालमेल की गुंजाइश दिखाई देती है।

‘मैडम इंस्पेक्टर' केवल हत्याओं की गुत्थी सुलझाने वाली कहानी बनकर नहीं रह जाती। यह स्त्री की आजादी, उसके फैसलों और समाज की सोच पर सवाल उठाती है। यह सीरीज़ रहस्य, अपराध और मनोवैज्ञानिक पहलुओं में रुचि रखने वाले के लिए है। इसकी गति और अभिनय इसे प्रभावशाली बनाते हैं। कथानक में कुछ और नवीनता तथा पात्रों के मनोविज्ञान की गहराई इसे और बेहतर बना सकती थी।