तमाम शहर के रस्ते सजा दिए जाएं…!

· Indore

तमाम शहर के रस्ते सजा दिए जाएं…!

कल सुबह उस सड़क पर घूमने वाले हैरान थे कि कहीं रातोंरात निजाम तो नहीं बदल गया, कॉक्रोच पार्टी का ‘सत्ता से हटाओ’ नारा कहीं सफल तो नहीं हो गया! यह तो वैसा ही चमत्कार था कि सुदामा जब कृष्ण से भेंट कर लौटे तो देखा, उनकी झोपड़ी गायब थी और वहां महल खड़ा था। इस तरह के तमाम अजूबे इस रातोंरात के बदलाव में शामिल कर सकते हैं।

यह सड़क बरसों से स्थित-प्रज्ञ है, इसे कुछ नहीं व्यापता! सरकार आती और जाती रही, मगर इसकी हालत भी देश के किसान-मजदूर जैसी ही रही, कोई बदलाव नहीं हुआ। यहां घूमने वाले झुण्ड में भी चल रहे हों तो, उन्हें सारे गड्ढे अंखस्थ हैं कि कितनी भी गंभीर बहस हो रही हो, गड्ढे फलांगना या बच कर निकल जाना नहीं भूलते। कुछ तो इतने वरिष्ठ हो चुके हैं कि आंख बंद कर बता देते हैं कि अब कौन-सा गड्ढा या रबर का खंडित स्पीड-ब्रेकर आने वाला है।

कभी यदि स्कूटर या फटफटी से गुजरना हो तो पीछे बैठा, बातें करते-करते यह बताता चलता है कि अब दाएं ले ले, आगे बड़ा गड्ढा है या अब बाएं ले ले, आगे सड़क उखड़ी है। यहां तक कि कभी रात में भी गुजरना हो और बत्ती गुल रहती ही है तो ये अंधेरे में भी उधड़ी सडक, खुले चेम्बर या स्पीड ब्रेकर का अंदाज लगा लेते हैं!

ऐसा नहीं है कि इस बारे में शिकायत नहीं हुई। यहां विधायक जैसे रोज ही आते हैं घूमने, पर अब उनकी चलती नहीं। पार्षद कभी मिलते नहीं और मिल जाएं, तो शिकायत का असर नहीं। कुछ खोदाई के काम तो यहां सदियों से यूं चल रहे हैं, जैसे पेट्रोल या डीजल की खोज हो रही हो। यह अकेली सड़क नहीं है, इससे जुड़ने वाली सभी सड़कों की यही गति है।

… लेकिन, कल सुबह तो जैसे घूरे के दिन फिरे, बारह साल में पहली बार इस सड़क पर चलने वालों को असुविधा हो रही है कि जहां स्थायी गड्ढा था, वहां अब समतल है। सड़क पर थेगले जरूर लगे हैं, लेकिन गड्ढों के मुंह वैसे ही बंद हैं, जैसे सरकार से सवाल पूछो तो जवाब नहीं आता है। सुबह सैर करने वाले बौराए-से कभी इस सड़क की तरफ जा रहे हैं तो कभी उस सड़क की तरफ। उनकी हालत सावन के उस नाबीना की तरह है, जिसे सब तरफ हरा ही हरा नजर आ रहा है!

जी हां, यह कायाकल्प है इंदौर के डेली कॉलेज के भव्य द्वार तक आने वाली सड़कों का। यूं समझ लीजिये। शिवाजी स्टेचू तक वसंत छाया है, बस, मूसाखेड़ी वाली सड़क आंसू बहा रही है कि लगे हाथ मेरा भी उद्धार कर जाते रामजी। चूंकि इधर से आली जनाब नहीं गुजरेंगे, इसलिए इस सड़क पर पहले जैसा यथावत है।

अब समझ आ रहा है कि डेली कॉलेज में आर. एस. एस. के समारोह के लिए क्यों मंजूरी दी गई, कम से कम इधर की बदहाली तो ठीक हो जायेगी। यदि अगली बार ऐसा कोई जमावड़ा हो तो जिद कर के अपने इलाके में रखवा लीजिएगा, देखना, नगर निगम कैसा मुस्तैद नजर आता है।

हां, बिजली का वह जंग खाया खम्भा, जो डेली कॉलेज के ठीक सामने अभी भी, बीच सड़क में सीना ताने खड़ा है, जिससे हर हफ्ते कोई ना कोई टकराता जरूर है। स्वयंसेवकों के जिम्मे होगा शायद यह काम कि वहां खड़े रहें और बचाते रहें गाड़ियों को।

इस बार तो थेगले ही लगे हैं कि संघ-प्रमुख ही आ रहे हैं… यदि और अच्छी सड़क चाहिए तो अगली बार प्रधानमंत्री को मेहमान बना लें, ये ऊबड़-खाबड़ सड़कें, यदि भूतपूर्व फिल्मी हीरोइन के गाल जैसी ना हो जाएं, तो नाम बदल देना!