डेढ़ अक्ल... नमूना!

· Indore

डेढ़ अक्ल... नमूना!

रामहित यादव को (अंग्रेजी में राम-हिट) ‘राम ने यादव को मारा’ कर देने पर चुनाव आयोग के खिलाफ खूब हंसी जाहिर की गई। आप के नेता संजयसिंह ने कहा कि राम ने यादव को ही क्यों मारा... शर्मा, वर्मा, ठाकुर, राजपूत, जैन को क्यों नहीं मारा... क्या आज लोगों का कम्प्यूटर भी जातिवादी हो गया है। अभी इस पर हंगामा हो ही रहा था कि दूसरा मामला और आ गया कि रवि शर्मा के पिता रामहित शर्मा का नाम ‘राम ने शर्मा को मारा’ कर दिया तो उत्तरप्रदेश के चुनाव आयुक्त बल्लियों उछल पड़े कि यादव को ही नहीं, राम ने अब शर्मा को भी मार दिया है। अति-उत्साह में नवदीप रिनवा ने एक्स पर पोस्ट डाल दी और अपनी कॉलर ऊंची करने लगे! इस पर भी जब आलोचना होने लगी कि सवाल यादव या शर्मा को मारने का नहीं है, नाम में ऐसी गलती कैसे हो जाती है, जबकि यह काम मशीन नहीं, बीएलओ यानी चुनाव में लगे कर्मचारी करते हैं। यदि ये कर्मचारी इसी देश के हैं, तंजानिया या चीन से नहीं आए हैं तो उन्हें नाम का मतलब नहीं पता है। अनुवाद करने के लिए किसने कहा उनसे। नवदीप रिनवा ने ‘राम ने शर्मा को मारा’ बताते हुए यह भी लिख दिया कि ‘हम खुशकिस्मत हैं कि शर्मा को मारा है’ से यह साबित हो गया कि हमारे यहां जातिवाद नहीं है। शर्मनाक यह है कि बंदे ने उस गलती का जिक्र नहीं किया और माफी भी नहीं मांगी कि इस तरह की गलती सिर्फ लापरवाही का ही सबूत है। खुश हो रहे हैं कि शर्मा को भी मारा!

जब इस पर भी खिंचाई होने लगी तो फिर माफी मांग ली। क्या इतने बड़े पद पर बैठने वालों में इतनी आम समझ भी नहीं है कि यादव के बदले शर्मा को मार दिया जाए... तो खुद को ‘खुशकिस्मत’ समझने या बताने की जरूरत नहीं है! उन्हें यह भी पता नहीं है कि किस बात पर खुद को खुशकिस्मत और कमअक्ल मानना चाहिए। छाती फुलाने के बजाय इस तरह के डेढ़ सौ नाम का सत्यानाश करने पर माफी मांग लेते, खेद जता देते तो इतनी भद् नहीं पिटती। अब कह रहे हैं कि जिसे भी बुरा लगा हो... या नाराज हों, उनसे माफी चाहते हैं। इसी को कहते हैं डेढ़ अक्ल! जितनी जरूरत हो, उतना ही मुंह खोलने से कम से कम नासमझी तो बची रहती है, जगजाहिर नहीं होती! अब रायता फैला दिया है तो सोरना भी पड़ेगा ही!