खेल दिलचस्प... मगर पकड़ कमजोर!

फोन अगर दस साल पीछे बैठे आदमी से बात करा दे तो पहले हैरानी होगी और फिर डर लगेगा। जब वह आदमी बीते समय में कुछ बदलकर आज की जिंदगी अपने हिसाब से चलाने लगे।
‘तू है मेरी किरण’ इसी दिलचस्प खयाल पर बनी है। यहाँ खतरा सिर्फ जिद्दी आशिक से नहीं है बल्कि उस ताकत से है जिसके सहारे वह किसी की मर्जी और जिंदगी पर कब्जा करना चाहता है। कहानी में रोमांस से ज्यादा रहस्य और बेचैनी की गुंजाइश है।
सोनाक्षी सिन्हा का किरदार किरण लेखक है। पहली किताब सफल रही थी लेकिन दूसरी आगे नहीं बढ़ रही। पति के साथ नए घर में आने पर उसे पुराना मोबाइल मिलता है। उससे समर से बात होती है जिसे जहीर इकबाल ने निभाया है। किरण 2026 में है और समर 2016 में। शुरुआत में यह बातचीत दोनों के लिए एक पहेली है, लेकिन धीरे-धीरे समर की दिलचस्पी ऐसी जिद बन जाती है जिससे किरण की जिंदगी खतरे में पड़ने लगती है। उसे समझना है कि उसके साथ हो क्या रहा है और वह इससे निकले कैसे।
फिल्म ‘डर’ याद आती है लेकिन करण रावल ने यहाँ दीवानगी के साथ समय का खेल जोड़ दिया है। किसी का पीछा करने वाला आदमी अगर उसके बीते समय तक पहुँच रखता हो तो उससे बचना कितना मुश्किल होगा, यही सवाल कहानी को ताकत देता है। समर की पकड़ से निकलने की कोशिश में अच्छे सस्पेंस की गुंजाइश बनती है। फिल्म मुश्किल जगह पर भी पहुँचती है जब उसके गलत बतावव्यवहार के पीछे की तकलीफ दिखाकर उसके लिए हमदर्दी जुटाने लगती है। किसी का दुख अपनी जगह है लेकिन उससे दूसरे की जिंदगी पर हक नहीं मिल जाता।
दिक्कत कहानी के खयाल में कम और उसे निभाने में ज्यादा है। शुरुआत उत्सुकता जगाती है मगर आगे कुछ मोड़ भरोसा कमजोर करते हैं। ऐसी फिल्म में हर रहस्य का वैज्ञानिक जवाब देना जरूरी नहीं है लेकिन उसके अपने नियम साफ होने चाहिए। दर्शक को समझ आना चाहिए कि खतरा कहाँ तक जा सकता है और उससे बचने की गुंजाइश क्या है। यहाँ कई सवाल अधूरे रह जाते हैं। चौंकाने की कोशिश में कहानी कहीं-कहीं इतनी उलझती है कि किरदारों का डर महसूस करने के बजाय घटनाओं का हिसाब लगाना पड़ता है।
सोनाक्षी को ऐसी भूमिका मिली है जिसमें उत्सुकता से घबराहट और फिर अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश तक जाने की जगह है। उनका किरदार कहानी का इमोशनल सहारा बनता है। जहीर के समर में खतरा है लेकिन उसके जुनून की परतें और खुलतीं तो असर बढ़ता। सिर्फ किसी को पाने की जिद दिखाना काफी नहीं है। उस जिद से सामने वाले की जिंदगी कैसे तबाह होती है, यह भी उतनी ही मजबूती से उभरना चाहिए था। अंकित गुप्ता पति की भूमिका में हैं जबकि पूर्णेंदु भट्टाचार्य और जरीना वहाब को कहानी में ज्यादा जगह नहीं मिलती। करण रावल समय में आगे-पीछे जाती कहानी को जोड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन फिल्म की रफ्तार एक जैसी नहीं रहती। कुछ हिस्से अगला मोड़ जानने की तलब बनाए रखते हैं तो कुछ रिश्ते जल्दबाजी में बदलते दिखाई देते हैं। सम्वाद भी किरदारों को अलग पहचान देने के बजाय ज्यादातर कहानी आगे बढ़ाने का काम करते हैं। अगर आपसी रिश्ते और बेहतर लिखे गए होते तो इस पूरे खेल को ज्यादा बेचैन करने वाला बना सकते थे।
ना रोको और ‘हमसफर’ जैसे गाने हैं। कैमरे का काम और सजे घर कहानी को साफ-सुथरा बना देते हैं। कपड़ों में भी चमक है लेकिन फिल्म का असर इन चीजों से ज्यादा उसकी लिखावट पर टिका है। ‘तू है मेरी किरण’ के पास ध्यान खींचने वाला विचार है और कुछ अच्छे मोड़ भी हैं। बस जिस मजबूत पकड़ की इस कहानी को जरूरत थी, वह आखिर तक नहीं बन पाती। रहस्य वाली अलग तरह की कहानी पसंद है तो ये फिल्म आपके काम की हो सकती है।