लेखन को चाहिए, एक उम्र असर होने तक!

· Indore

लेखन को चाहिए, एक उम्र असर होने तक!

कुमार अंबुज हिंदी के जाने-माने कवि और लेखक हैं, जिनकी रचनाओं में इंसान, समाज, लोकतंत्र और आज के दौर के सवालों की झलक मिलती है। उनसे फुरकान खान की बातचीत...

यहां क्या सिखाते हैं ?

* हमारा मूल सरोकार साहित्य और विचार है। इसमें समाज विज्ञान और हमारे समय की राजनीति सहित कई विषय होते हैं। इन्हीं मुद्दों पर अलग-अलग बात करते हैं। मसलन, इस सम्मेलन में एक विषय है, लेखक, संगठन, विचार और प्रतिबद्धता। दूसरा विषय है कि भूमंडलीय समय में लेखक का हस्तक्षेप क्या होना चाहिए। इनमें आने वाले लेखक, श्रोता और शहर के दूसरे लोग इन मुद्दों को नए नजरिए से देख पाते हैं। वो समझते हैं कि किसी विषय पर हमारा विचार क्या है और उसे देखने के दूसरे कौन-से तरीके हो सकते हैं। इससे विमर्श पैदा होता है। यथार्थ देखने के कई तरीके होते हैं और हम उसमें अपना वैचारिक हस्तक्षेप करते हैं।

नई पीढ़ी को लेकर कहा जाता है कि पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी कम हो रही है। क्या लेखकों को युवाओं तक पहुंचने के लिए कुछ अलग करना चाहिए ?

* पढ़ने-लिखने में कमी आना या उसका बढ़ना केवल लेखक पर निर्भर नहीं करता। इसमें परिवार, हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक माहौल और सरकारों के साथ संस्थाओं की बड़ी भूमिका होती है। सत्ता के ढांचे तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि समाज में किन को तरजीह मिलेगी। लेखक का काम अच्छा लिखना है और वो उसे लोगों तक पहुंचाने में योगदान कर सकता है। किताबें छपवाकर, बातचीत कर और लोगों को जमा कर ऐसा कर सकता है। अभी यहां कई किताबों और फिल्मों का जिक्र हुआ। लेकिन समाज में शिक्षा बढ़े, साहित्य और कलाओं में दिलचस्पी आए, इसके लिए सबकी कोशिश की जरूरत है। आप किसी मध्यवर्गीय परिवार का उदाहरण लीजिए। वहां सोफा, फ्रिज, टीवी और तमाम आधुनिक सुविधाएं हो सकती हैं, लेकिन अगर घर में छोटी-सी लाइब्रेरी नहीं है, तो लेखक जाकर वहां लाइब्रेरी नहीं बना सकता। परिवार और समाज में पढ़ने का माहौल बनाना होगा। अच्छा साहित्य पढ़ाया जाना चाहिए। लेखक अपने विचारों से योगदान दे सकता है और जहां मौका मिले, दखल भी दे सकता है। लेकिन जिम्मेदारी समाज की है।

नए लिखने वालों से उम्मीद ?

* हां, क्यों नहीं ! लेकिन लेखन कला है और इसमें किसी लेखक के भविष्य का आकलन केवल चार-छह महीने या दो साल में नहीं किया जा सकता। लंबे अभ्यास और साधना का विषय है। कई बार पांच, दस या पंद्रह साल के लेखन के बाद ही किसी लेखक की दिशा के बारे में कुछ ठोस कहा जा सकता है। हाल में कुछ कवियों के संग्रह पढ़े, तो उनसे उम्मीद बंधी है। राजस्थान के कवि प्रभात, कवयित्री रूपम मिश्रा और अदनान कफील दरवेश जैसे नाम खास हैं। मनोज पांडे ने दर्जनों अच्छी कहानियां लिखी हैं। ऐसे कई लेखक हैं, जिनके काम को देखकर लगता है कि बेहतर कर रहे हैं।

जो युवा लेखक बनना चाहते हैं, उन्हें कहां से शुरुआत करनी चाहिए ?

* सबसे पहले समझना होगा कि आप समाज के बारे में क्या सोचते हैं। आपकी सामाजिक नजर कैसी है ? अगर समाज को केवल आदर्श ख्वाब की तरह देखते हैं और भाषा के सहारे रोमांस से भरी रचनाएं लिखना चाहते हैं, तो आपका लेखन अलग दिशा में जाएगा। लेकिन अगर आप अपने समय की चुनौतियों, यथार्थ और जीवन की मुश्किलों को समझना चाहते हैं, तो आपको ऐसे साहित्य की ओर जाना चाहिए, जो इन सवालों से जूझता हो। जरूरी नहीं कि हर रचना सीधे राजनीति पर ही हो। मान लीजिए, आप लिखते हैं कि हमारे परिवारों में टूटन आ गई है। यह भी सामाजिक और राजनीतिक अर्थ रखने वाला विषय है। इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य में आ रहे बदलाव या बेरोजगारी पर लिखना अपने समय को समझना है। युवा लेखक गंभीरता से इन विषयों पर विचार करें। वो जितनी गहराई से आसपास के जीवन को समझेंगे, उनका लेखन उतना ही सार्थक हो सकेगा।

आजकल लेखक तो लेफ्ट विंग और राइट विंग में बंट गए हैं। क्या साहित्य में कोई लेखक न्यूट्रल हो सकता है ?

* मुझे लगता है कि न्यूट्रल कुछ नहीं होता। जो खुद को न्यूट्रल कहता है, वो किसी-ना-किसी तरह किसी की मदद कर रहा होता है। साहित्य और कला में विचार का अर्थ किसी चुनाव में वोट देने या किसी दल का प्रचार करने तक नहीं है। विचार तय करता है कि हम दुनिया को किस तरह देखते हैं। एक नजरिया हो सकता है कि दुनिया जैसी है, उसे उसी तरह कुबूल कर लिया जाए और उसी तरह चलते रहने दिया जाए। दूसरा नजरिया कहता है कि दुनिया लगातार बन रही है और इसमें बदलाव किया जा सकता है। जो अच्छा है, उसे बनाए रखते हुए जो कमियां हैं, उन्हें बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

तो क्या साहित्य में वामपंथ का मतलब केवल राजनीति करना है, या इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है ?

* इसका दायरा बहुत बड़ा है। वामपंथ का अर्थ दुनिया को स्थिर ना मानना और बेहतर बनाने की संभावना में विश्वास करना है। बदलाव इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि दूसरी प्रजातियों, पर्यावरण और पूरे तंत्र के लिए भी अहम है। ये हमारी सोच को देश की सीमाओं और नक्शों पर खींची गई रेखाओं से आगे ले जाता है। इससे हम इंसान की परेशानियों को समझ पाते हैं। इसकी बड़ी खासियत वैज्ञानिक नजरिया है। यानी चीजें जैसी हैं, उन्हें उससे बेहतर बनाया जा सकता है और इसके लिए हमें हस्तक्षेप करना चाहिए, अपना विचार रखना चाहिए। ये समानता की ओर ले जाता है, हमारी अलग-अलग अस्मिताओं पर विमर्श करता है, स्वतंत्रता की परिभाषा को व्यापक बनाता है और न्याय की आकांक्षा को मजबूत करता है। साहित्य की भूमिका केवल वर्तमान को दर्ज करना नहीं है, बल्कि उसकी कमियों को पहचानना और एक बेहतर दुनिया की कल्पना करना भी है !